महिलाओं का सम्मान

जब मैं महिलाओं के सम्मान में कोई आलेख अथवा रचना पढ़ती हूं तो मेरा मन गद्गद् हो उठता है। कितना बता नहीं सकती। हमारा समाज महिलाओं के संस्कारों, संस्कृति, उनकी सुरक्षा, पवित्रता और ऐसे ही कितने शब्द जो मुझे अभी स्मरण नहीं आ रहे, मेरा शब्दकोष संकुचित हो गया है, मेरे स्मृति-कक्ष में उभर आते हैं और मैं आनन्दित होने लगती हूं।

आप जानना चाहेंगे और न भी जानना चाहें तो भी मैं बताना चाहूंगी कि आज मेरा मन इतना आनन्दित क्यों है।

आज एक परम मित्र लेखक महोदय का ऐसा ही एक आलेख अथवा एक संक्षिप्त टिप्पणी पढ़ने के लिए मिली जो महिलाओं के बारे में बहुत विचारात्मक एवं उनके प्रति चिन्ता करते हुए लिखी गई थी। अब मैं तो मैं हूं, सीधी बात तो समझ ही नहीं आती।

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उनका कथन है

नदियों अथवा पवित्र कुंड़ या सरोवरों पर स्नान के समय अपने परिवार की महिलाओं को पूरे वस्त्र के साथ स्नान करने हेतु कहें। महिलाएं स्वयं इस बात का संज्ञान लें और कम वस्त्र नहींए पूरे वस्त्र के साथ स्नान करें। अब सरकार या सामाजिक संस्थाओं द्वारा वस्त्र बदलने के लिए लगभग हर जगह सुविधाएं दी गई हैं। उनका उपयोग करें।

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दुर्भाग्यवश ही कह सकती हूं, मैं कुछ समय पूर्व ही दो बार हरिद्वार गई। दोनों ही बार एक तो शनिवार अथवा रविवार था और साथ ही एक बार अमावस्या थी और दूसरी बार गंगा-दशहरा। अर्थात भीड़ ही भीड़, लाखों लोग। पहली बार हमने अपने गंतव्य से बहुत दूर गाड़ी पार्क कर दी जिस कारण हमें हर की पौड़ी पर पैदल ही बहुत  चलना पड़ा। मुख्य स्थल जहां स्नान की व्यवस्था है, वहां हमारा जाना हुआ। हम लोग वहां लगभग एक घंटा अथवा उससे भी अधिक समय रहे। मैंने किसी भी महिला को निर्वस्त्र अथवा कम वस्त्रों में स्नान करते नहीं देखा। सभी महिलाएं पूरे वस्त्रों में गिन कर कुछ डुबकियां लगातीं थीं और बाहर आ जाती थीं, प्रायः साड़ी पहने महिलाएं केवल साड़ी फैलाकर, झाड़कर हवा ले रही थीं न कि वस्त्र उतार रही थीं अथवा खुले में बदल रही थीं। अथवा वे अपनी गाड़ी में आकर वस़्त्र परिवर्तन कर रही थीं। पूरी हर की पौड़ी तक जो न जाने कितने मीलों तक फैली है मुझे केवल दो स्थान दिखे महिलाओं के लिए कपड़े बदलने के लिए। 

सम्भव है मेरे भीतर भारतीय संस्कृति, परम्पराओं की समझ का अभाव हो, किन्तु गंगा में स्नान विशेषकर, महिलाओं का , मुझे कभी भी समझ नहीं आया। गंगा किनारे अस्थियां प्रवाहित हो रही थीं, लोग पिंड-दान करवा रहे थे, पूजा-सामग्री जल में तिरोहित हो रही थी, और न जाने क्या-क्या। मटमैला जल था, उसमें स्नान प्रक्रिया चल रही थी।

लौटती हूं मुख्य विषय पर।

 किन्तु पुरुष, पूर्ण नग्न होकर ही जल में उतर रहे थे और बाहर आकर साथी से तौलिया मांगकर फैलाकर लपेट रहे थे। वे जल में निरन्तर किलोल कर रहे थे। मैं क्षमा प्रार्थी हूं कि ऐसी भाषा लिख रही हूं किन्तु यही शाश्वत सत्य है कि पुरुष कभी भी सामाजिक, पारिवारिक अथवा कहीं भी कोई संकोच नहीं करते। इसमें कोई संदेह नहीं कि महिलाएं आधुनिक वेशभूषा पहनने लगी हैं, देह प्रदर्शनीय वस्त्र। किन्तु अकारण ही केवल लिखने के लिए लिख देना कदापि शोभा नहीं देता।

     

समझौता

हेलो बच्चों ! कैसे हो ?

हम ठीक हैं आंटी, आप कैसी हैं?

अक्सर यह वार्तालाप मेरे और उन दोनों बच्चों के बीच होता रहता था। अमित और अर्पित दोनों चचेरे भाई थे। एक ही स्कूल में पढ़ते थे। पड़ोस में ही रहते थे, और बाहर मैदान में खेलते, साईकल पर घूमते  मुझे अक्सर मिल जाया करते थे।

कुछ दिन बाद मेरा ध्यान गया कि आजकल दोनों ही दिखाई नहीं दे रहे हैं और एक-दो बार दिखाई दिये तो अलग-अलग।

उस दिन अर्पित मिल गया। मैंने जानना चाहा कि आजकल साथ क्यों नहीं दिखाई दे रहे। तो उसने बताया कि दोनों परिवारों में ज़मीन को लेकर झगड़ा हो गया है, शायद केस भी किया है आपस में पापा ने, हमें भी मिलने और आपस में खेलने से मना कर दिया है। साथ नहीं जाने देते।

अर्थात, बड़ों के झगड़ों में बच्चों का बालपन भी छिन रहा था। वे भी अब आपस में बात नहीं करते थे और खेलते भी नहीं थे। स्कूल भी अलग-अलग जाने लगे थे। मुझे जब भी मिलते उदास लगते।

एक दिन स्कूल से लौटते हुए मुझे दोनों मिल गये। रुककर मुझसे बात करने लगे कि आंटी आप ही समझाओ न हमारे मम्मी-पापा को। मैंने उन्हें समझाया कि यह उनका पारिवारिक मामला है और कोई बाहर का इस बारे में उनसे बात नहीं कर सकता। किन्तु मेरे दिमाग में एक योजना आई और मैंने दोनों बच्चों से कहा कि मैं तुम्हें एक योजना बताती हूॅं हो सकता है मामला सुलझ जाये। बच्चे मान गये।

 मेरी योजना के अनुसार अब दोनों अपने-अपने घर में अपने माता-पिता के साथ जायदाद और मुकदमे की बात करने लगते।  बार-बार पूछते कि पापा, बताओ इस लड़ाई में हमें कितने पैसे मिलेंगे। आप मुझे कार लेकर दोगे क्या। मेरा भी अपना मकान बन जायेगा क्या, मैं भी अर्पित को अपने घर में नहीं घुसने दूंगा। यही बातें अमित भी अपने घर में कहता। माता-पिता उन्हें डांटते कि बच्चो यह बड़ों की बातें हैं तुम इन मामलों में मत बोला करो।  बच्चों का उत्तर होता कि पापा बात तो पूरे घर की ही होती है, हम छोटे हैं तो क्या हुआ, घर तो हमारा भी है और हम आपके बच्चे हैं तो हमें तो आज से ही यह सब समझ जाना चाहिए। कल को मेरा भाई भी तो मुझसे लड़ सकता है। तो आज से ही आप मुझे सब सिखाओ।। दोनों घरों में रोज़ शाम को बच्चे खूब हल्ला करते और माता-पिता को खूब परेशान। न पढ़ाई न खेल और न ही कोई काम। बस यही बातें पूछते और करते रहते।  स्कूल में भी वे अपने दोस्तों के साथ बैठकर जायदाद,  पैसे और मुकदमों की बातें करते रहते। जल्दी ही स्कूल से दोनों ही घरों में बच्चों की शिकायतें आने लगीं।

परिणाम वही हुआ जो होना था। दोनों ही परिवारों की समझ में आने लगा कि हमारी धन की लालसा हमारी अगली पीढ़ी को भी बरबाद कर देगी, जो बात बैठकर सुलझाई जा सकती है उसे कोर्ट-कचहरी में न खींचा जाये, साथ ही धन और समय की बरबादी।

दोनों ही परिवार साथ आये, धन का लालच छोड़ा और बड़ों की सलाह से समझौता करके एक हो गये।

     

छोटी-छोटी रोशनियाँ मिलती रहें
तिमिर में कभी जुगनुओं की रोशनियों का आनन्द लिया करते थे

पता नहीं कहाँ चले गये, टिमटिम करते आनन्द दिया करते थे

छोटी-छोटी रोशनियाँ मिलती रहें, जीवन की धार चली रहती है

गहन अंधेरे में भी मन से रोशनियों का आनन्द लिया करते थे

भ्रम-जाल

पता नहीं किस

भ्रम में रहते हैं हम

कि बदल रहा है

बहुत कुछ,

या आने वाला कल

बदलकर आयेगा

और अब

बहुत कुछ

अच्छा ही अच्छा लायेगा।

लेकिन कुछ नहीं बदलता।

बस तरीके बदलते हैं

ढर्रे बदलते हैं

रास्ते अलग-से लगते हैं

लेकिन 

आज का दौर

हो या कल का

सब एक-सा ही होता है,

शेष तो भ्रम-जाल होता है।

     

नया-पुराना

कुछ अलग-सा ही होता है

दिसम्बर।

पहले तो

बहुत प्रतीक्षा करवाता है

और आते ही

चलने की बात

करने लगता है।

कहता है

पुराना जायेगा तभी तो

कुछ नया आयेगा।

और जब नया आयेगा

तो कुछ पुराना जायेगा।

लेकिन

नये और पुराने के

बीच की दूरियॉं

पाटने में ही

ज़िन्दगी निकल जाती है

और हम नासमझ

बस हिसाब लगाते रह जाते हैं।

चलिए, आज

नये-पुराने को छोड़

बस आज की ही बात करते हैं

और आनन्द मनाते हैं।

     

उदास है मौसम y

कई दिनों से

उदास-सा है मौसम।

न हॅंसता है,

न मुस्कुराता है,

मानों रोशनी से कतराता है।

बस गहरी चादर ओढ़े

जैसे मुॅंह छुपाकर बैठा है।

दिन-रात का एहसास

कहीं खो गया है,

कभी ओस-से आँसू

ढलकते हैं

कभी कोहरे में सिसकता है

और कभी आँसुओं से

सराबोर हो जाता है।

 

ये हल्की बारिश

ये कंपकंपाती हवाएं

ये बिखरे ओस-कण

लगता है

अब दर्द हुआ है जनवरी को

दिसम्बर के जाने का।

     

अतीत का मोह

अतीत की तहों में

रही होंगी कभी

कुछ खूबसूरत इमारतें

गगनचुम्बी मीनारें

स्वर्ण-रजत से मढ़े सिंहासन

धवल-जल-प्रवाह

मरमरी संगमरमर पर

संगीत की सुमधुर लहरियाँ ।

हमारी आंखों पर चढ़ा होता है

उस अनदेखे सौन्दर्य का

ऐसा परदा

कि हम वर्तमान में

जीना ही भूल जाते हैं।

और उस अतीत के मोह में

वर्तमान कहीं भूत में चला जाता है

और सब गड्मगड् हो जाता है।

भूत और वर्तमान के बीच उलझे

लौट-लौटकर देखते हैं

परखते हैं

और उस अतीत को ही

संजोने के प्रयास में लगे रहते हैं।

अतीत

चाहे कितना भी सुनहरा हो

काल के गाल में

रिसता तो है ही

और हम

अतीत के मोह से चिपके

विरासतें सम्हालते रह जाते हैं

और वर्तमान गह्वर में

डूबता चला जाता है।

खुदाईयों से मिलते हैं

काल-कलवित कंकाल,

हज़ारों-लाखों वर्ष पुरानी वस्तुएँ

उन्हें रूपाकार देने में

सुरक्षित रखने में

लगाते हैं अरबों-खरबों लगाते हैं

और वर्तमान के लिए

अगली पीढ़ी का

मुहँ ताकने लगते हैं।

आधुनिकता की दौड़

आधुनिकता की दौड़ में

कौन कहाॅं तक जा पहुॅंचा

नहीं जान पाते हैं हम।

धरा बची नहीं

गगन छूते भवन

आॅंख देख पाती नहीं।

हवाओं में ज़िन्दगी नहीं

मौत आने लगी है

न जाने कैसे जीने लगे हैं हम।

धुॅंआ -धुॅंआ हो रही ज़िन्दगी

न जाने किन खयालों में

खोने लगे हैं हम।

दरकते पर्वतों को

चीर-चीर

राहें बना रहे

और उन्हीं राहों पर

ज़िन्दगियाॅं गॅंवा रहे हैं हम।

कचरे के पर्वतों पर जी रहे,

जल-प्लावन

और सूखे की मार

झेल रही

सदानीरा नदियाॅं

कचरे का अम्बार बना रहे हैं हम।

चेहरों पर आवरण किये

अपने-आपसे ही मुॅंह छुपा रहे हैं हम।

     

कैसी है ये ज़िन्दगी

बहुत लम्बी है ज़िन्दगी।

पल-पल का

हिसाब नहीं रखना चाहती।

किन्तु चाहने से

क्या होता है।

जिन पलों को

भूलना चाहती हूॅं

वे मन-मस्तिष्क पर

गहरे से

मानों गढ़ जाते हैं

और जो पल

जीवन में भले-से थे

वे कहाॅं याद आते हैं।

कैसी है ये ज़िन्दगी।

     

शून्य दिखलाई देता है

न जाने कैसी सोच हो गई

अपने भी अब

अपनों-से न लगते हैं।

नींद नहीं आती रातों को

सोच-सोचकर

मन भटके है।

ऐसी क्या बात हो गई,

अब भीड़ भरे रिश्तों में

शून्य दिखलाई देता है

अवसर पर कोई नहीं मिलता,

 सब भागे-दौड़े दिखते हैं।

चल आज काम बदल लें

चल आज काम बदल लें

मैं चलाऊॅं हल, खोदूंगी खेत

तुम घर चलाना।

 

राशन-पानी भर लाना

भोजन ताज़ा है बनाना

माता-पिता की सेवा करना

घर अच्छे-से बुहारना।

बर्तन-भांडे सब मांज कर लगाना।

फ़सल की रखवाली मैं कर लूंगी

तुम ज़रा झाड़ू-पोचा लगाना।

सब्ज़ी-भाजी अच्छे-से ले आना।

दूध-दहीं भी लेकर आना।

बच्चों की दूध-मलाई-रोटी

माता-पिता और भाई-बहन का खाना

सब अलग-अलग-से है बनाना।

बच्चों के कपड़े अच्छे से प्रैस हों,

जूते पालिश, बैग में पुस्तकें

और होम-वर्क सब है करवाना।

न करना देरी

स्कूल समय से जायें

टिफ़िन अच्छे-से बनाना।

नाश्ता, दोपहरी रोटी,

संध्या का जल-पान

और रात की रोटी

सब ताज़ा, अलग-अलग

और सबकी पसन्द का है बनाना।

मां की रोटी में नमक कम रहे

पिता की थाली में मीठा

भाई को देना घी की रोटी

बहन मांगेगी पिज़्जा बर्गर

सब कुछ है लाना।

कपड़ों का भी ध्यान रहे

धोकर धूप में है सुखाना।

और हां,

मेरी रोटी दोपहरी में दे जाना

ज़रा ध्यान रहे,

रोटी, साग, सब्ज़ी, लस्सी, पानी,

अचार-मिर्ची सब रहे।

कुछ लेबर के लिए भी लेते आना।

बैल की कमान थामी है मैंने

चूड़ी, कंगन, माला, हार

सब रख आई हूं

ज़रूरत पड़े तो पहन जाना।

नया- पुराना

कुछ अलग-सा ही होता है

दिसम्बर।

पहले तो

बहुत प्रतीक्षा करवाता है

और आते ही

चलने की बात

करने लगता है।

कहता है

पुराना जायेगा तभी तो

कुछ नया आयेगा।

और जब नया आयेगा

तो कुछ पुराना जायेगा।

लेकिन

नये और पुराने के

बीच की दूरियां

पाटने में ही

ज़िन्दगी निकल जाती है

और हम नासमझ

बस हिसाब लगाते रह जाते हैं।

     

 

ज़िन्दगी है कि रेत-घड़ी

काल-चक्र की गति

कौन समझ पाया है

.

हम हाथों पर

घड़ियाँ बांधकर,

दीवार पर घड़ियां टांगकर

समझते हैं

समय हमारे अनुसार चलेगा।

ये घड़ियां

समय तो बताती है

किन्तु हमारा समय कहां बता पाती हैं।

हमारी ही तरह

घड़ियों का भी समय

बदलने लगता है

कोई धीमी चलने लगती है

किसी की सूई टूट जाती है

किसी के सैल चुक जाते हैं

तो कोई गिरकर टूट जाती है।

और घड़ियां नहीं बतातीं

कि दिख रहा समय

दिन का है

अथवा रात का।

यह समझने के लिए

तो हमें

सूरज-चांद

अंधेरे और रोशनी से टकराना पड़ता है।

-

और ज़िन्दगी है कि

रेत-घड़ी की तरह

रिसती रहती है।

     

मन के रंग

डालियों से छिटक-कर

बिखर गये हैं

धरा पर ये पुष्प

शायद मेरे ही लिए।

 

सोचती हूॅं

हाथों में समेट लूॅं

चाहतों में भर लूॅं

रंगों से

जीवन को महका लूॅं

इससे पहले

कि ये रंग बदल लें

क्यों न मैं इनके साथ

अपने मन के रंग बना लूॅं।

     

पीड़ा का मर्म

कौन समझ सकता है

पीड़ा के मर्म को

मुस्कानों, हॅंसी

और ठहाकों के पीछे छिपी।

देखने वाले कहते हैं

इतनी ज़ोर से हॅंसती है

आॅंखों से आॅंसू

बह जाते हैं इसके।

-

काश!

ऐसे हम भी होते।

-

मैं कहती हूॅं

अच्छा है

आप ऐसे नहीं हैं।

     

शादी का लड्डू
हमारे बड़े-बुज़ुर्ग 

बहुत कुछ कह जाते थे।

यह पता नहीं

कि वे आपबीती कहते थे

यह जग-देखी।

किन्तु उनका काम कहना था

और हमारा

सुनना और समझना।

हम जानते हैं

यह मनोविज्ञान

कि जिस कार्य के लिए

जितना ही मना किया जाये

उसे करने की ललक

उतनी ही बढ़ती है।

कहा था न

कि शादी का लड्डू जो खाये

वह भी पछताये

और जो न खाये

वह भी पछताये।

अब समझ-समझ की

समझ-समझ की बात थी।

सोचा

जब पछताना ही है तो

खाकर ही पछताया जाये।

आपकी क्या राय है।

     

न्याय अंधा होता है या बहरा

जान नहीं पाई आज तक

न्याय अंधा होता है

या बहरा।

लेकिन इतना जानती हूॅं

कि परिधान बदलने से

स्वभाव नहीं बदल जाता,

आंखों से पट्टी हटने से

न्याय का मार्ग सुगम नहीं होता।

हम सीधे-सादे लोग

बड़ी जल्दी

कुछ गलतफ़हमियों में

फ़ंस जाते हैं।

मूर्ति की आंखों से

पट्टी क्या हटी

सोचने लगे

अब तो न्याय की गंगा बहेगी।

हर दिन पवित्र स्नान होगा

और हम न्याय के जल से

आचमन करेेंगे।

अब पट्टी न्याय की थी

अथवा अन्याय की

यही समझ न सकी।

न्याय कैसा होता है

किसके लिए होता है

और किस रास्ते से होता है

वही समझ सकता है

जिसने न्याय की आस में

कभी जीवन के सालों-साल

बरबाद किये हों।

न्याय की देवी के

नये स्वरूप के लिए

करोड़ों-करोड़ों रुपये लगे होंगें,

किन्तु हर आम आदमी

आज भी

अपना अधिकार पाने के लिए

न्यायालय के दरबार में

अपनी जमा-पूंजी लुटाता

वैसे ही भटक रहा है

जैसे मूर्ति के नये स्वरूप से पहले

भटका करता था।

वह नहीं देख-समझ पाता

कि मूर्ति का रूप बदलने मात्र से

न्याय का रूप कैसे बदल सकता है।

ंकैसे लाखों निरपराध

एक दिन की सुनवाई के लिए

सालों-साल कारागार में काट देते हैं

और कैसे घोषित अपराधी

समाज में जीवन साधिकार बिता लेते हैं।

काश! मूर्ति के नये स्वरूप के साथ

न्याय की प्रक्रिया भी कुछ बदलती,

तारीखें न मिलकर

न्याय की आस मिलती,

उसे मूर्तियॉं नहीं दिखती

दिखती है तो मिटती आस,

विलम्बित न्याय

जो अक्सर

अन्याय से भी बुरा होता है।

मौन साधना है

कहते हैं

मौन साधना है

चुप रहना

बड़ी हिम्मत का काम है।

 

तो फिर यह

इतनी लम्बी जिह्वा

किसलिए मिली है हमें

बतलायेगा कोई।

मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु अच्छा

एक पुरानी कहावत है : मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु अच्छा होता है,  चलिए आज इस मुहावरे की चीर-फ़ाड़ करते हैं।

 

मित्र कौन है? मेरी समझ में मित्र वह है जो हमारी अच्छाईयों-बुराईयों के साथ हमें स्वीकार करता है। जिससे हम निःसंकोच अपना सुख-दुख, परेशानी बांट सकते हैं और उससे सामाजिक, मानसिक सहयोग की आशा रखते हैं। जो हमें, हमारे परिवार के साथ हमें स्वीकार करता है, जो हमें हमारी कमियों के साथ तो स्वीकार करता ही है और हमारी गलतियों के लिए हमें डांटने, मना करने, रोकने का भी साहस रखता है, वही मित्र कहलाता है और यही अपेक्षाएॅं वह हमसे भी करता है।

किन्तु शत्रु की हमारे मन में एक सीधी-सी व्याख्या है कि यह व्यक्ति हमारे लिए जो भी करेगा, बुरा ही करेगा।

किन्तु हम शत्रु किसे मानें और क्यों मानें। मित्र शब्द को परिभाषित करना जितना सरल और शत्रु शब्द को परिभाषित करना उतना ही कठिन। दूरियाॅं, अनबन, नाराज़गी जैसे भाव सरल होते हैं किन्तु शत्रु शब्द बहुत ही गहरा एवं नकारात्मक है जहाॅं अच्छाई और सच्चाई के लिए कोई जगह ही नहीं रह जाती।

मेरी समझ तो यह कहती है कि यदि शत्रु बुद्धिमान होगा तब तो उससे और भी सावधान रहने की आवश्यकता है। मूर्ख मित्र से भी ज़्यादा। मूर्ख मित्र भूल कर सकता है, नादानी कर सकता है किन्तु धोखा, छल-कपट, धूर्तता, प्रवंचना नहीं कर सकता।

यह ज़रूरी नहीं है कि पुरानी सभी कहावतें, मुहावरे ठीक ही हों।

शत्रु तो शत्रु ही रहेगा, बुद्धिमान हो अथवा मूर्ख।

मित्र स्वीकार हैं, और जो वास्तव में मित्र होते हैं वे मित्रों के लिए कभी भी मूर्ख हो ही नहीं सकते। और यदि  हैं भी तो भी स्वीकार्य हैं।  और शत्रुओं की तो वैसे ही जीवन में कमी नहीं है, बुद्धिमान, मूर्ख सबकी लाईन लगी है, एक ढूॅंढने निकलो, हज़ार मिलते हैं।

वर्तमान में दुनिया आभासी मित्रों एवं शत्रुओं से ज़्यादा बौखलाई दिखती है।

  

बह रही ठण्डी हवाएँ
बह रही ठण्डी हवाएँ, मौसम में है खलबली
रवि-घन उलझ रहे, चिड़िया हो गई चुलबुली
शीत-धूप के बीच ओस-कण हैं बिखर रहे 
बूँद-बूँद से नम धरा देखो कैसे महक चली

रेत पर कदम Steps On Sand
रेत पर कदम बड़ी मुश्किल से सम्हलते हैं

धूप में नयन जल का भ्रम पैदा करते हैं

मृगमरीचिका में ही बीत जाता है जीवन

हम फिर भी खुशियाँ   ढूँढ  लिया करते हैं।

जिह्वा की तलवार
क्रोध में ठीक से भाव व्यक्त कर नहीं पाती

अपनी भावनाओं पर नियन्त्रण रख नहीं पाती

चाहती तो हूॅं शब्दों से ही कत्ल कर दूॅं तेरा

पर जिह्वा की तलवार को धार दे नहीं पाती

मेरे दिल के घाव
नहीं चाहती मैं मेरे दिल के घाव बादलों-से बरसें

नहीं चाहती मैं मेरे दिल के घाव कोई भी पढ़ ले

अपने ही हाथों में अपना दिल थामकर बैठी हूॅं मैं

नहीं चाहती मैं मेरे दिल के हाल पर कुछ लिख ले

मीठी वाणी भूल गये
आचार-विचार परखें औरों के, अपनी भाषा अशुद्ध

नये-नये शब्द गढ़ रहे, कहते भाषा हमारी विशुद्ध

मीठी वाणी तो कबके भूल गये, कटाक्ष करें हरदम

कभी-कभी तो लगता जाने क्यों रहते हैं यूॅं क्रुद्ध

मन कलपता है

भला-बुरा यहाॅं सब साथ-साथ चलता है

मन बहका है कहाॅं अच्छी बातों में रमता है

इसकी, उसकी, सबकी करते दिन बीते है

अपनी बारी आती है तब मन कलपता है

माॅं की अॅंगूठी

अंगुलियों से ज़्यादा

माॅं के पल्लू में

बंधी देखी है हमने

माॅं की अनमोल छोटी-सी अॅंगूठी।

बस

एक ही अॅंगूठी

तो हुआ करती थी

उसके पास।

किसी सौन्दर्य का प्रतीक नहीं थी

माॅं के लिए वह अॅंगूठी,

स्वर्ण का मोह भी नहीं

किन्तु अनमोल थी उसके लिए।

जब कभी पूछा माॅं से

अॅंगुली से उतारकर

पल्लू में क्यों बाॅंध लेती हो

अपनी अॅंगूठी।

सहज उत्तर होता था उसका

काम करते हुए

खराब हो जाती है,

बर्तन मांजते

बर्तनों की रगड़ से 

घिस जाती है,

आटा-मिट्टी, मसाले फॅंस जाते हैं

स्वर्ण की किंकरी गिर जाती है,

ऐसा कहती थी माॅं।

स्वर्ण बहुत मॅंहगा होता है ,

बहुत अनमोल।

हम छू-छूकर देखते थे

और माॅं हॅंस देती थी

लेकिन कभी भी हमारे हाथ नहीं देती थी।

बस रात को सोते समय

पल्लू से खोलकर

पहन लेती थी

और प्रातः उठते ही फिर पल्लू में

चली जाती थी।

अपने मन से करके जी

एक अनुभव है मेरा।

कार्यालयों में

अपनी क्षमता से बढ़कर

काम करने वाले,

अपने-आपको

बड़ा तीसमारखां समझते हैं।

 पहले-पहल तो

बड़ा आनन्द मिलता है,

सब चाटुकारिता में लगे रहते हैं

सराहना के पहाड़ खड़े करते हैं,

गुणों की खान बताते हैं

झाड़ पर चढ़ाते हैं

मदद की पुकार लगाते हैं।

अपनी समस्याएॅं बताकर

अपना काम उन पर थोपकर

नट जाते हैं।

मुॅंह पर  खूब बड़ाई करते हैं,

पीठ पीछे न जाने कितनी

पदवियों से सुशोभित करते हैं

और जी भर कर उपहास करते हैं।

किन्तु

जब तक उन्हें

अपना शोषण समझ आने लगता है

तीर, कमान से निकल चुका होता है।

काम के साथ

त्रुटियों का पहाड़ भी उनके ही

सर पर खड़ा होता है।

.

 हे नारी!

मेरी बात समझ आई

कि नहीं आई।

उतना कर

जितना कर सके।

कर, लेकिन

मर-मरकर न कर।

अपनी सीमाएॅं बाॅंध।

देवी, दुर्गा, सती, न्यारी-प्यारी

के मोह में न पड़

अबला-सबला,

प्रेम-प्यार की बातें न सुन।

महानता के पदकों से

जीवन नहीं चलता।

तेरे चक्रव्यूह में

सात नहीं सैंकड़ों योद्धा हैं

पहले ही सम्हल ले।

गुणों का घड़ा बड़ी जल्दी फूटता है

अवगुणों का भण्डार हर दम भरता है।

और एक बार भर जाये

फिर जीवन-भर नहीं उतरता है।

.

अपने लिए भी जी

लम्बी तान कर अपने मन से जी

जी भरकर जी,

पीठ पर बोझा लाद-लादकर न जी

मुट्ठियाॅं बाॅंधकर रख

मन से जी, अपने मन से जी

सबकी सुन

लेकिन अपने मन से करके जी।

खुशियों को आवाज़ दे रही
मन के भावों को थाप दे रही

खुशियों को आवाज़ दे रही

ढोल बाजे मन झूम-झूम जाये

कदम बहक रहे, ताल दे रही।

प्रकृति का सौन्दर्य निरख

सांसें

जब रुकती हैं,

मन भीगता है,

कहीं दर्द होता है,

अकेलापन सालता है।

तब प्रकृति

अपने अनुपम रूप में

बुलाती है

समझाती है,

देख, रंगों की महक देख

बदलते रंगों की चहक देख

रंगोें में एकमेक  भाव देख

जल की तरलता देख

ठहरे जल में प्रतिबिम्ब देख।

प्रतिबिम्बों में सौन्दर्य देख,

देख

डालियां

कैसे

झुक-झुक मन मदमाती हैं।

सब कहती हैं

समय बदलता है।

धूप है तो बरसात भी।

आंधी है तो पतझड़ भी।

सूखा है तो ताल भी।

मन मत हो उदास

प्रकृति का सौन्दर्य निरख।

आनन्द में रह।

चाहतें भी थोड़ी-सी

गगन की उड़ान है

छोटा-सा मकान है

चाहतें भी छोटी ही

बादलों में स्थान है।