प्रकृति का सौन्दर्य निरख
सांसें
जब रुकती हैं,
मन भीगता है,
कहीं दर्द होता है,
अकेलापन सालता है।
तब प्रकृति
अपने अनुपम रूप में
बुलाती है
समझाती है,
देख, रंगों की महक देख
बदलते रंगों की चहक देख
रंगोें में एकमेक भाव देख
जल की तरलता देख
ठहरे जल में प्रतिबिम्ब देख।
प्रतिबिम्बों में सौन्दर्य देख,
देख
डालियां
कैसे
झुक-झुक मन मदमाती हैं।
सब कहती हैं
समय बदलता है।
धूप है तो बरसात भी।
आंधी है तो पतझड़ भी।
सूखा है तो ताल भी।
मन मत हो उदास
प्रकृति का सौन्दर्य निरख।
आनन्द में रह।