तेरा विश्वास

तेरा विश्वास

जब-जब किया

तब-तब ज़िन्दगी ने

पाठ पढ़ाया।

उस ईश्वर ने कहा

तुझे भी तो दिया था

एक दिमाग़

उसमें कचरा नहीं था,

बहुत कुछ था।

किन्तु

जब प्रयोग नहीं किया

तो वह

कचरा ही बन गया

अब दोष मुझे देते हो

कि

ऐसा साथ क्यों दिया।

     

समय यूँ ही बीत जाता है

एकान्त

कभी-कभी अच्छा लगता है।

सूनापन

मन में रमता है।

जल, धरा, गगन

मानों परस्पर बातें करते हैं,

जीवन छलकता है।

नाव रुकी, ठहरी-ठहरी-सी

परख रही हवाएँ

जीवन यूँ ही चलता है।

अंधेरा, रोशनी,

जीवन में धुंधलापन

बहकता है।

हाथों में डोरी

कुछ सवाल बुनती है

कभी उधेड़ती है

कभी समेटती है

समय यूँ ही बीत जाता है।

     

अंधेरे के बाद सवेरा
अंधेरे के बाद सवेरा !

ज़रूरी तो नहीं

रोशनी भी लेकर आये।

कभी-कभी

सवेरे भी अंधकारमय होते हैं।

सूरज बहका-बहका-सा

घूमता है।

किरणें कहीं खो जाती हैं।

भीतर ही भीतर

बौखला जाती हैं।

आंखें धुंधली हो जाती हैं,

दिखाई कुछ नहीं देता

किन्तु

हाथ बढ़ाने पर

अनदेखी रोशनियों से

हाथ जलने जाते हैं

अंधेरे और रोशनियों के बीच

ज़िन्दगी कहीं खो जाती है।

      

 

मृग-मरीचिका-सा जीवन

मृग-मरीचिका-सा जीवन

कभी धूप छलकती

कभी नदी बिखरती

कभी रेत संवरती।

कदम-दर-कदम

बढ़ते रहे।

जो मिला

ले लिया,

जो मिला

उसी की आस में

चलते रहे, चलते रहे, चलते रहे

कभी बिखरते रहे

कभी कण-कण संवरते रहे।

     

ऐसा नहीं होता

पता नहीं कौन कह गया

बूंद-बूंद से सागर भरता है।

सुनी-सुनाई पर

सभी कह देते हैं।

कभी देखा भी है सागर

उसकी गहराई

उसकी तलछट

उसके ज्वार-भाटे।

यहाँ  तो बूंद-बूंद से

घट नहीं भरता

सागर क्या भरेगा।

कहने वालो

कभी आकर मिलो न

सागर क्या

मेरा घट ही भरकर दिखला दो न।

     

कैसी है ये ज़िन्दगी

बहुत लम्बी है ज़िन्दगी।

पल-पल का

हिसाब नहीं रखना चाहती।

किन्तु चाहने से

क्या होता है।

जिन पलों को

भूलना चाहती हूॅं

वे मन-मस्तिष्क पर

गहरे से

मानों गढ़ जाते हैं

और जो पल

जीवन में भले-से थे

वे कहाॅं याद आते हैं।

कैसी है ये ज़िन्दगी।

     

शून्य दिखलाई देता है

न जाने कैसी सोच हो गई

अपने भी अब

अपनों-से न लगते हैं।

नींद नहीं आती रातों को

सोच-सोचकर

मन भटके है।

ऐसी क्या बात हो गई,

अब भीड़ भरे रिश्तों में

शून्य दिखलाई देता है

अवसर पर कोई नहीं मिलता,

 सब भागे-दौड़े दिखते हैं।

मन के रंग

डालियों से छिटक-कर

बिखर गये हैं

धरा पर ये पुष्प

शायद मेरे ही लिए।

 

सोचती हूॅं

हाथों में समेट लूॅं

चाहतों में भर लूॅं

रंगों से

जीवन को महका लूॅं

इससे पहले

कि ये रंग बदल लें

क्यों न मैं इनके साथ

अपने मन के रंग बना लूॅं।

     

पीड़ा का मर्म

कौन समझ सकता है

पीड़ा के मर्म को

मुस्कानों, हॅंसी

और ठहाकों के पीछे छिपी।

देखने वाले कहते हैं

इतनी ज़ोर से हॅंसती है

आॅंखों से आॅंसू

बह जाते हैं इसके।

-

काश!

ऐसे हम भी होते।

-

मैं कहती हूॅं

अच्छा है

आप ऐसे नहीं हैं।

     

मौन साधना है

कहते हैं

मौन साधना है

चुप रहना

बड़ी हिम्मत का काम है।

 

तो फिर यह

इतनी लम्बी जिह्वा

किसलिए मिली है हमें

बतलायेगा कोई।

अपनी राहें आप बनाता चल

संसार विवादों से रहित नहीं है,

उसको हाशिए पर रखता चल।

अपनी चाल पर बस ध्यान दे

औरों को अॅंगूठा दिखाता चल।

कोई क्या बोल रहा न ध्यान दे

अपने मन की सुन, गाता चल।

तेरे पैरों के नीचे की ज़मीन

खींचने को तैयार बैठे हैं लोग

न परवाह कर,

धरा ही क्या

गगन पर भी छाता चल।

आॅंधी हो या तूफ़ान

अपनी राहें आप बनाता चल।

चौखट पर सपने

पलकों की चौखट पर सपने

इक आहट से जग जाते हैं।

बन्द कर देने पर भी

निरन्तर द्वार खटखटाते हैं।

आॅंखों में नींद नहीं रहती

फिर भी सपने छूट नहीं पाते हैं।

कुछ देखे, कुछ अनदेखे सपने

भीतर ही भीतर कुलबुलाते हैं।

नहीं चाहती कोई समझ पाये

मेरे सपनों की माया

पर आॅंखें मूॅंद लेने पर भी

कोरों पर नम-से उभर आते हैं।

पहाड़ों की टेढ़ी-मेढ़ी  पगडण्डिया

पहाड़ों की टेढ़ी-मेढ़ी

संकरी पगडण्डियाॅं

जीवन में उतर आईं,

सीधे-सादे रास्ते

अनायास ही

मनचले हो गये।

कूदते-फाॅंदते

जीवन में आते रहे

उतार-चढ़ाव

और हम

आगे बढ़ते रहे।

फ़िसलन बहुत हो जाती है

जब बरसता है पानी

गिरती है बर्फ़

रुई के फ़ाहों-सी,

आॅंखों को

एक अलग तरह की

राहत मिलती है।

जीवन में

टेढ़ेपन का

अपना ही आनन्द होता है।

बोलना भूलने लगते  हैं

चुप रहने की

अक्सर

बहुत कीमत चुकानी पड़ती है

जब हम

अपने ही हक़ में

बोलना भूलने लगते  हैं।

केवल

औरों की बात

सुनने लगते हैं।

धीरे-धीरे हमारी सोच

हमारी समझ कुंद होने लगती है

और जिह्वा पर

काई लग जाती है

हम औरों के ढंग से जीने लगते हैं

या सच कहूॅं

तो मरने लगते हैं। 

खाली हाथ

मन करता है

रोज़ कुछ नया लिखूॅं

किन्तु न मन सम्हलता है

न अॅंगुलियाॅं साथ देती हैं

विचारों का झंझावात उमड़ता है

मन में कसक रहती है

लौट-लौटकर

वही पुरानी बातें

दोहराती हैं।

 नये विचारों के लिए

जूझती हूॅं

अपने-आपसे बहसती हूॅं

तर्क-वितर्क करती हूॅं

नया-पुराना सब खंगालती हूॅं

और खाली हाथ लौट आती हूॅं।

हादसे
हादसे

ज़िन्दगी के नहीं होते

ज़िन्दगी ही कभी-कभी

हादसा बनकर रह जाती है।

सारे दर्शन, फ़लसफ़े, उपदेश

धरे के धरे रह जाते हैं

और ज़िन्दगी

पता नहीं

कहाॅं की कहाॅं निकल जाती है।

कोई मील-पत्थर

कोई दिशा-निर्देश काम नहीं आते

यूॅं ही

लुढ़कते, उबरते,

गिरते-उठते

ज़िन्दगी निकल जाती है।

जाने कौन कह गया

ज़िन्दगी हसीन है

ज़िन्दगी ख्वाब है

ज़िन्दगी प्यार है।

 

प्यारे, सच बोलें तो

ज़िन्दगी हादसों का सफ़र है।

विप्लव की चिन्ता मत करना

धीरज की भी

सीमाएँ होती हैं,

बांधकर रखना।

पर इतनी ही

बांध कर रखना

कि दूसरे

तुम्हारी सीमाओं को

लांघ न पायें।

और

तुम जब चाहो

अपनी सीमाओं के

बांध तोड़ सको।

फिर

विप्लव की चिन्ता मत करना।

डरते हैं क्या

जीवन के सन्दर्भ में

जब भी बात करते हैं

केवल सीढ़ियाॅं

चढ़ने की ही बात करते हैं

कभी उतरने

अथवा

सीढ़ियों से

पैर फ़िसलने की बात नहीं करते।

डरते हैं क्या ?

समझ समझ की बात
 कहावत है

बड़ों का कहा

और आंवले का खाया

बाद में मीठा लगता है।

जब किसी ने समझाया था

तब तो

समझ में आया था।

आज जीवन के इस मोड़ पर

समझ आने से क्या होगा

जो खोना था

खो दिया

और जो मिल सकता था

उससे हाथ धो बैठे।

 

आप्त वाक्य

कभी-कभी आप्त वाक्य

बड़े कष्टकारी होते हैं।

जीवन में हम चाहते कुछ हैं,

मिलता कुछ है।

किसी ने कह दिया

जहां चाह, वहां राह।

काश!

कि ऐसा ही होता जीवन में।

चाह तो थी

चांद-सितारों की,

मां ने चुनरी पर टांक दिये।

और मैं

ओढ़नी सिर पर लिए

आकाश में उड़ने लगी।

मन की बात

रातों को

महसूस किया है कभी आपने।

कितनी भी रोशनी कर लें

कभी-कभी

अंधेरा  टूटता ही नहीं।

रातें अंधेरी ही होती हैं

फिर भी

न जाने क्यों

बार-बार कह बैठते हैं

कितनी अंधेरी होती हैं रातें।

शायद हम

रात की बात नहीं करते

अपने मन की बात करते हैं।

क्या अन्त यही है

टूटा तो नहीं है

डाल से छूटकर भी

बिखरा तो नहीं है

धरा पर

ठहरा-सा लगता है

मानों सोच रहा हो

क्या यही जीवन है

लौट सकता नहीं,

जीवन से जुड़ सकता नहीं

क्या अन्त यही है

 

हाईकु: धारा

धारा निर्बाध

भावों में हलचल

आंखों में पानी

-

अविरल है

धारा की तरलता

भाव क्यों रूखे

-

धारा निश्छल

चंदा की परछाईं

मन बहके

 

फ़ागुन की आहट

फ़ागुन की आहट

मानों जीवन में

मधुर सी गुनगुनाहट

हवाओं में फूलों की महक

नव-पल्लव अंकुरित

वृक्षों की शाखाओं से

पंछियों की

मधुर कलरव

पत्तों की मरमर

तृण मानों 

ओस की बूंदों से

कर रहे शरारत।

भीगा-भीगा-सा मौसम

कभी धूप कभी छांव

कहता है

ले ले आनन्द

पता नहीं

फिर कब मिलेगा यह जीवन।

 

ज़िन्दगी की लम्बी राहों में

साथ कोई

उम्र-भर देता नहीं है

जानते हैं हम, फिर भी

मन को मनाते नहीं हैं।

मुड़-मुड़कर देखते रहते हैं

जाने वालों को हम

भुला पाते नहीं हैं।

ज़िन्दगी की लम्बी राहों में

न जाने कितने छूट गये

कितने हमें भूल गये

याद अब कर पाते नहीं हैं।

फिर भी इक टीस-सी अक्सर

दिल में उभरती रहती है

जिसे हम नकार पाते नहीं हैं।

चेहरे बदल लें

चलो आज चेहरे बदल लें।

बहुत दिन बीत गये।

लोग अब

हमारी

असलियत

पहचानने लगे हैं

हमें

बहुत अच्छे से

जानने लगे हैं।

 

खरपतवार

वही फ़सल काटते हैं

जो हम बोते हैं,

ऐसा नहीं होता यारो।

जीवन में

खरपतवार का भी

कोई महत्व है

या नहीं।

नहले पे दहला
तू 

नहले पे दहला

लगाना सीख ले

नहीं तो

गुलाम

बनकर

रह जायेगा

 

ज़िन्दगी जीने के तरीके

ज़िन्दगी जीने के

तरीके

यूॅं तो मुझे

ज़िन्दगी जीने के

तरीके बहुत आते हैं

किन्तु क्या करुॅं मैं

उदाहरण और उलाहने

बहुत सताते हैं।

 

दिल  या दिमाग

मित्र कहते हैं,

बात पसन्द न आये

तो एक कान से सुनो,

दूसरे से निकाल दो।

किन्तु मैं क्या करूॅं।

मेरे दोनों कानों के बीच

रास्ता नहीं है।

या तो

दिल को जाकर लगती है

या दिमाग भन्नाती है।