मृग-मरीचिका-सा जीवन

मृग-मरीचिका-सा जीवन

कभी धूप छलकती

कभी नदी बिखरती

कभी रेत संवरती।

कदम-दर-कदम

बढ़ते रहे।

जो मिला

ले लिया,

जो मिला

उसी की आस में

चलते रहे, चलते रहे, चलते रहे

कभी बिखरते रहे

कभी कण-कण संवरते रहे।