अंधेरे के बाद सवेरा

अंधेरे के बाद सवेरा !

ज़रूरी तो नहीं

रोशनी भी लेकर आये।

कभी-कभी

सवेरे भी अंधकारमय होते हैं।

सूरज बहका-बहका-सा

घूमता है।

किरणें कहीं खो जाती हैं।

भीतर ही भीतर

बौखला जाती हैं।

आंखें धुंधली हो जाती हैं,

दिखाई कुछ नहीं देता

किन्तु

हाथ बढ़ाने पर

अनदेखी रोशनियों से

हाथ जलने जाते हैं

अंधेरे और रोशनियों के बीच

ज़िन्दगी कहीं खो जाती है।