ऐसा नहीं होता
पता नहीं कौन कह गया
बूंद-बूंद से सागर भरता है।
सुनी-सुनाई पर
सभी कह देते हैं।
कभी देखा भी है सागर
उसकी गहराई
उसकी तलछट
उसके ज्वार-भाटे।
यहाँ तो बूंद-बूंद से
घट नहीं भरता
सागर क्या भरेगा।
कहने वालो
कभी आकर मिलो न
सागर क्या
मेरा घट ही भरकर दिखला दो न।