जीवन की आपा-धापी में

सालों बाद, बस यूँ ही

पुस्तकों की आलमारी

खोल बैठी।

पन्ना-पन्ना मेरे हाथ आया,

घबराकर मैंने हाथ बढ़ाया,

बहुत प्रयास किया मैंने

पर बिखरे पन्नों को

नहीं समेट पाई,

देखा,

पुस्तकों के नाम बदल गये

आकार बदल गये

भाव बदल गये।

जीवन की आपा-धापी में

संवाद बदल गये।

प्रारम्भ और अन्त

उलझ गये।

 

कड़वा सच
हिम्मत से मेरे घर आना

चाय-पानी भूलकर

कड़वा सच पिलवाऊँगी

 

 

अपने कर्मों पर रख पकड़
चाहे न याद कर किसी को

पर अपने कर्मों से डर

न कर पूजा किसी की

पर अपने कर्मों पर रख पकड़ ।

न आराधना के गीत गा किसी के

बस मन में शुद्ध भाव ला ।

हाथ जोड़ प्रणाम कर

सद्भाव दे,

मन में एक विश्वास

और आस दे।  

 

कशमकश

कशमकश

इस बात की नहीं

कि जो मुझे मिला

जितना मुझे मिला

उसके लिए

ईश्वर को धन्यवाद दूँ,

कशमकश इस बात की

कि कहीं

तुम्हें

मुझसे ज़्यादा तो नहीं मिल गया।

 

दिमाग़ में भरे भूसे का

घर जितना पुराना होता  जाता है

अनचाही वस्तुओं का

भण्डार भी

उतना ही बड़ा होने लगता है।

सब अत्यावश्यक भी लगता है

और निरर्थक भी।

यही हाल आज

हमारे दिमाग़ में

भरे भूसे का है

अपने-आपको खन्ने खाँ

समझते हैं

और मौके सिर

आँख, नाक, कान, मुँह पर

सब जगह ताले लग जाते हैं।

गलत और सही

कहते हैं

अन्त सही तो सब सही।

किन्तु मेरे गले ऐसे

बोध-भाव नहीं उतरते।

शायद जीवन की कड़वाहटें हैं

या कुछ और।

किन्तु यदि

प्रारम्भ सही न हो तो

अन्त कैसे हो सकता है सही।

 

आँसू और मुस्कुराहट

तुम्हारी छोटी-छोटी बातें

अक्सर

बड़ी चोट दे जाती हैं

पूछते नहीं तुम

क्या हुआ

बस डाँटकर

चल देते हो।

मैं भी आँसुओं के भीतर

मुस्कुरा कर रह जाती हूँ।

बसन्त

आज बसन्त मुझे

कुछ उदास लगा

रंग बदलने लगे हैं।

बदलते रंगों की भी

एक सुगन्ध होती है

बदलते भावों के साथ

अन्तर्मन को

महका-महका जाती है।

 

 

शब्द  और  भाव

बड़े सुन्दर भाव हैं

दया, करूणा, कृपा।

किन्तु कभी-कभी

कभी-कभी क्यों,

अक्सर

आहत कर जाते हैं

ये भाव

जहां शब्द कुछ और होते हैं

और भाव कुछ और।

शब्द  भावहीन होते हैं

कुछ भावों के

शब्द नहीं होते

और कुछ शब्द

भावहीन होते हैं

तरसता है मन।

मुहब्बतों की कहानियां

मुझे इश्तहार सी लगती हैं

ये मुहब्बतों की कहानियां

कृत्रिम सजावट के साथ

बनठन कर खिंचे चित्र

आँखों तक खिंची

लम्बी मुस्कान

हाथों में यूँ हाथ

मानों

कहीं छोड़कर न भाग जाये।

 

कैसे आया बसन्त

बसन्त यूँ ही नहीं आ जाता

कि वर्ष, तिथि, दिन बदले

और लीजिए

आ गया बसन्त।

-

मन के उपवन में

सुमधुर भावों की रिमझिम

कुछ ओस की बूंदें बहकीं

कुछ खुशबू कुछ रंगों के संग

कहीं दूर कोयल कूक उठी।

 

क्यों करना दु:ख करना यारो

जरा, अनुभव, पतझड़ की बातें

मत करना यारो

मदमस्त मौमस की

मस्ती हम लूट रहे हैं

जो रीत गया

उसका क्यों है दु:ख करना यारो

 

भावों में भंवर

भावों में भी

भंवर बनते हैं

एक बार फ़ंसने पर

निकलना बहुत कठिन होता है।

 

खामोश शब्द

भावों को

आकार देने का प्रयास

निरर्थक रहता है अक्सर

शब्द भी

खामोश हो जाते हैं तब

 

कुछ शब्द

कुछ दूरियों को

कदमों से नापने में

सालों लग जाते हैं

और कुछ शब्द

सब दूरियाँ मिटाकर

निकट लाकर खड़ा कर देते हैं।

 

फागुन आया

बादलों के बीच से

चाँद झांकने लगा

हवाएँ मुखरित हुईं

रवि-किरणों के

आलोक में

प्रकृति गुनगुनाई

मन में

जैसे तान छिड़ी,

लो फागुन आया।

विध्वंस की आशंका

विध्वंस की आशंका से

आज ही

नवनिर्माण में जुटे हैं

इसलिए

अपने-आप ही

तोड़- फ़ोड़ में लगे है।

   

मित्रता

कृष्ण और सुदामा की मित्रता

यह नहीं

कि एक धनी ने

निर्धन की मदद की,

बल्कि यह

कि मददगार ने

मदद करके

एहसान जताने का

अवसर नहीं दिया।

 

मेरा नाम श्रमिक है

कहते हैं

पैरों के नीचे

ज़मीन हो

और सिर पर छत

तो ज़िन्दगी

आसान हो जाती है।

किन्तु

जिनके पैरों के नीचे

छत हो

और सिर पर

खुला आसमान

उनका क्या !!!

 

 

 

 

होने का एहसास

साथ-साथ होकर भी

आस-पास होकर भी

दिन-रात होकर भी

अक्सर साथ नहीं होते ।n

 

और मीलों दूर बैठै भी

देश-दुनिया बेखबर

दिला जाते हैं

साथ-साथ

अपने आस-पास

होने का एहसास।

 

भीतर तक

दीवारों में दरारें होना

ज़रूरी तो नहींए

ज़रा

मिट्टी की परत

हिलने से ही

दुनिया

भीतर तक

झांक लेती है।

 

अनजाने ही

दरारों से

झांकने की

यूँ आदत तो नहीं

किन्तु

कुछ सुराख

इतने महीन होते हैं

कि

अनजाने ही

दिल में

मिट्टी दरक जाती है।

 

आदतें ठीक नहीं मेरी

जानती हूँ

बहुत-सी आदतें

तो ठीक नहीं मेरी

पर

कोई अफ़सोस नहीं होता मुझे।

दुनिया-भर की

अच्छाईयों का ठेका

मेरा ही तो नहीं।

कुछ तुम ही

बदल जाओ

मेरे लिए।

 

उतर कभी धरा पर

अक्सर मन करता है

पूछूं चांद से

कहीं दूर

गगन में चमकता है

उतर कभी धरा पर

फिर देख कैसे

अंधेरा लीलता है,

भरपूर रोशनी में भी

कैसे अंधेरा बोलता है।

 

नई राहें

नई राहें

तो सरकार बनवाती है।

कभी मरम्मत करवाती है,

कभी गढ्ढे भरवाती है।

कभी पहाड़ कटते हैं,

तो कभी नदियों के

रास्ते बदलते हैं।

-

और हमारी राहें!

-

राहें तो पुरानी होती हैं

बस हमारी चालें

नई होती हैं।

आशाओं के दीप

सुना है

आशाओं के

दीप जलते हैं।

शायद

इसी कारण

बहुत छोटी होती है

आशाओं की आयु।

और

इसी कारण

हम

रोज़-हर-रोज़

नया दीप प्रज्वलित करते हैं

आशाओं के दीप

कभी बुझने नहीं देते।

 

ढोल बजा

चुनावों का अब बिगुल बजा

किसका-किसका ढोल बजा

किसको चुन लें, किसको छोड़ें

हर बार यही कहानी है

कभी ज़्यादा कभी कम पानी है

दिमाग़ की बत्ती गुल पड़ी है

आंखों पर पट्टी बंधी है

बस बातें करके सो जायेंगे

और सुबह फिर वही राग गायेंगे।

 

 

नेह की डोर

कुछ बन्धन

विश्वास के होते हैं

कुछ अपनेपन के

और कुछ एहसासों के।

एक नेह की डोर

बंधी रहती है इनमें

जिसका

ओर-छोर नहीं होता

गांठें भी नहीं होतीं

बस

अदृश्य भावों से जुड़ी

मन में बसीं

बेनाम

बेमिसाल

बेशकीमती।

  

खुशियों के रंग

द्वार पर अल्पना

मानों मन की कोई कल्पना

रंगों में रंग सजाती

मन के द्वार खटखटाती

पाहुन कब आयेगा

द्वार खटखटाएगा।

मन के भीतर

रंगीनियां सजेंगी

घर के भीतर

खुशियां बसेंगीं।