Trending Post

मन में बस सम्बल रखना

चिड़िया के बच्चे सी

उतरी थी मेरे आंगन में।

दुबकी, सहमी सी रहती थी

मेरे आंचल में।

चिड़िया सी चीं-चीं करती

दिन भर

घर-भर में रौनक भरती।

फिर कब पंख उगे

उड़ना सिखलाया तुझको।

धीरे धीरे भरना पग

समझाया तुझको।

दुर्गम हैं राहें,

तपती धरती है,

कंकड़ पत्थर बिखरे हैं,

कदम सम्हलकर रखना

बतलाया तुझको।

हाथ छोड़कर तेरा

पीछे हटती हूं।

अब तुझको

अपने ही दम पर

है आगे बढ़ना।

हिम्मत रखना।

डरना मत ।

जब मन में कुछ भ्रम हो

तो आंखें बन्द कर

करना याद मुझे।

कहीं नहीं जाती हूं

बस तेरे पीछे आती हूं।

मन में बस इतना ही

सम्बल रखना।

मेहनत करते हैं जीते हैं

 

मां ने बोला था कल लोहड़ी है, लकड़ी का न हुआ है इंतज़ाम

विद्यालय में कुछ पुराने पेड़ कटे थे, मैं ले आई माली से मांग

बस हर वक्त भूख, रोटी, लड़की, शोषण की ही बात मत कर

मेहनत करते हैं, जीते हैं अपने ढंग से, यह लो तुम भी मान

भीतर के भाव

हर पुस्तक के

आरम्भ और अन्त में

कुछ पृष्ठ

कोरे चिपका दिये जाते हैं

शायद

पुस्तकों को सहेजने के लिए।

किन्तु हम

बस पन्नों को ही

सहेजते रह जाते हैं

पुस्तकों के भीतर के भाव

कहाँ सहेज पाते हैं।

 

किसे अपना समझें किसे पराया

किसे अपना समझें किसे पराया 

मन के द्वार पर पहरे लगाकर बैठे हैं आज।

कोई भाव पढ़ न ले, गांठ बांध कर बैठे हैं आज।

किसे अपना समझें, किसे पराया, समझ नहीं,

अपनों को ही पराया समझ कर बैठे हैं आज।

मन करता करूँ बात चाँद  तारों से

मन करता करूँ बात चाँद  तारों से

जाने कितने भाव

कितनी बातें

अनकही, सुलझी-अनसुलझी

भीतर-ही-भीतर

कचोटती हैं

बिलखती हैं

बहुत कुछ बोलती हैं।

किसी से कहते हुए

मन डरता है

कहीं कोई पूछ ले

कोई बात की बात हो जाये

कहीं पुराने ज़ख्म खुल जायें

कहीं कोई अपनापन दिखाए

और हम शत्रुता का भाव पायें

जाने किस बात का

कौन-सा अर्थ निकल आये

खुले गगन के नीचे

चाँद -तारों से बतियाती हूँ

मन की हर बात बताती हूँ

और गहरी नींद सो जाती हूँ

     

चेहरों पर फूल मन में कांटे

हमारी आदतें भी अजीब सी हैं
बस एक बार तय कर लेते हैं
तो कर लेते हैं।
नज़रिया बदलना ही नहीं चाहते।
वैसे मुद्दे तो बहुत से हैं
किन्तु इस समय मेरी दृष्टि
इन कांटों पर है।
फूलों के रूप, रस, गंध, सौन्दर्य
की तो हम बहुत चर्चा करते हैं
किन्तु जब भी कांटों की बात उठती है
तो उन्हें बस फूलों के
परिप्रेक्ष्य में ही देखते हैं।

पता नहीं फूलों के संग कांटे होते हैं
अथवा कांटों के संग फूल।
लेकिन बात दोनों की अक्सर
साथ साथ होती है।

इधर कांटों में भी फूल खिलने लगे है
और  फूल
कांटों से चुभने लगे हैं।

लेकिन जब कांटों पर खिलते हैं फूल
तो हम कभी उनकी चर्चा ही नहीं करते।
बस इतना ही याद रख लिया है हमने
कि कांटों से चुभन होती है।
हां, होती है कांटों से चुभन।
लेकिन कांटा भी तो
कांटे से ही निकलता है।

और कभी छीलकर देखा है कांटों को
भीतर से कितने रसपूर्ण होते हैं ।
यह कांटे की प्रवृत्ति है
कि बाहर से तीक्ष्ण है,
पर भीतर ही भीतर खिलते हैं फूल।
एक अलग-सा
आकर्षण और सौन्दर्य
निहित होता है इनमें
जिसे परखना पड़ता है।
संजोकर देखना इन्हें,
जीवन भर अक्षुण्ण साथ देते है।

और जब मन में कांटे उगते हैं
तो यह पलभर का उद्वेलन नहीं होता।
जीवन रस
सूख सूख कर कांटों में बदल जाता है।
कोई जान न पाये इसे
इसलिए
कांटों की प्रवृत्ति के विपरीत
हम चेहरों पर फूल उगा लेते हैं
और मन में कांटे संजोये रहते हैं ।

दुनिया मेरी मुट्ठी में

बहुत बड़ा है जगत,

फिर भी कुछ सीढ़ियां चढ़कर

एक गुरूर में

अक्सर कह बैठते हैं हम

दुनिया मेरी मुट्ठी में।

सम्बन्ध रिस रहे हैं,

भाव बिखर रहे हैं,

सांसे थम रही हैं,

दूरियां बढ़ रही हैं।

अक्सर विपदाओं में

साथ खड़े होते हैं,

किन्तु यहां सब मुंह फेर पड़े हैं।

सच कहें तो लगता है,

न तेरे वश में, न मेरे वश में,

समझ से बाहर की बात हो गई है।

समय पर चेतते नहीं।

अब हाथ जोड़ें,

या प्रार्थनाएं करें,

बस देखते रहने भर की बात हो गई है।

गरीबी हटाओ देश बढ़ाओ

पिछले बहत्तर साल से

देश में

योजनाओं की भरमार है

धन अपार है।

मन्दिर-मस्जिद की लड़ाई में

धन की भरमार है।

चुनावों में अरबों-खरबों लुट गये

वादों की, इरादों की ,

किस्से-कहानियों की दरकार है।

खेलों के मैदान पर

अरबों-खरबों का

खिलवाड़ है।

रोज़ पढ़ती हूं अखबार

देर-देर तक सुनती हूं समाचार।

गरीबी हटेगी, गरीबी हटेगी

सुनते-सुनते सालों निकल गये।

सुना है देश

विकासशील से विकसित देश

बनने जा रहा है।

किन्तु अब भी

गरीब और गरीबी के नाम पर

खूब बिकते हैं वादे।

वातानूकूलित भवनों में

बन्द बोतलों का पानी पीकर

काजू-मूंगफ़ली टूंगकर

गरीबी की बात करते हैं।

किसकी गरीबी,

किसके लिए योजनाएं

और किसे घर

आज तक पता नहीं लग पाया।

किसके खुले खाते

और किसे मिली सहायता

आज तक कोई बता नहीं पाया।

फिर  वे

अपनी गरीबी का प्रचार करते हैं।

हम उनकी फ़कीरी से प्रभावित

बस उनकी ही बात करते हैं।

और इस चित्र को देखकर

आहें भरते हैं।

क्योंकि न वे कुछ करते हैं।

और न हम कुछ करते हैं।

 

 

क्या यह दृष्टि-भ्रम है

क्या यह दृष्टि-भ्रम है ?

मुझे नहीं दिखती

गहन जलप्लावन में

सिर पर टोकरी रखे

बच्चे के साथ गहरे पानी में

कोई माँ, डूबती-सी।

-

नहीं अनुभव होता मुझे

किसी किशन कन्हैया

नंद बाबा

यशोदा मैया या देवकी का।

-

शायद बहुत भावशून्य हूँ मैं,

आप कह सकते हैं।

-

मुझे दिखती हैं

अव्यवस्थाएँ

महलों में बनती योजनाएँ

दूरबीन से देखते

डूबता-तिरता आम आदमी

बोतलों में बन्द पानी

विमान से बनाते बांध

आकाश से गिरता भोजन।

-

कुछ दिन में आप ही

निकल जायेगा जल

सम्हल जायेगा आम आदमी

अगले वर्ष की प्रतीक्षा में।

-

लेकिन बस इतना ध्यान रहे

विभीषिका नाम, स्थान,

समय और काल नहीं देखती।

झोंपड़िया टूटती हैं

तो महल भी बिखर जाते हैं।

 

. प्रकृति कभी अपना स्वभाव नहीं छोड़ती

बड़ी देर से

समझ पाते हैं हम

प्रकृति

कभी अपना स्वभाव नहीं छोड़ती।

कहते हैं

शेर भूख मर जाता है

किन्तु घास नहीं खाता

और एक बार मानव-गंध लग जाये

तो कुछ और नहीं खाता।

तभी तो

हमारे बड़े-बुज़ुर्ग कह गये हैं

दोस्ती बराबर वालों से करो

गधा भी जब

दुलत्ती मारता है

तो बड़े-बड़ों के होश

गुम हो जाते हैं

और तुम हो कि

जंगल के राजा से

तकरार करने बैठे हो।

 

बूंद-बूंद से घट भरता था

जिन ढूंढा तिन पाईया

गहरे पानी पैठ,

बात पुरानी हो गई।

आंख में अब

पानी कहां रहा।

मन की सीप फूट गई।

दिल-सागर-नदिया

उथले-उथले हो गये।

तलछट में क्या ढूंढ रहे।

बूंद-बूंद से घट भरता था।

जब सीपी पर गिरती थी,

तब माणिक-मोती ढलता था।

अब ये कैसा मन है

या तो सब वीराना

सूखा-सूखा-सा रहता है,

और जब मन में

कुछ फंसता है,

तो अतिवृष्टि

सब साथ बहा ले जाती है,

कुछ भी तो नहीं बचता है।

 

 

मन हर्षाए बादल
 बिन मौसम आज आये बादल

कड़क-कड़क यूँ डराये बादल

पानी बरस-बरस मन भिगाये

शाम सुहानी, मन हर्षाए बादल

अनुभव की थाती

पर्वतों से टकराती, उबड़-खाबड़ राहों पर जब नदी-नीर-धार बहती है

कुछ सहती, कुछ गाती, कहीं गुनगुनाती, तब गंगा-सी निर्मल बन पाती है

अपनेपन की राहों में ,फूल उगें और कांटे न हों, ऐसा कम ही होता है

यूं ही जीवन में कुछ खोकर, कुछ पाकर, अनुभव की थाती बन पाती है।

शाम

हाइकु

शाम सुहानी

चंद्रमा की चांदनी

मन बहका

-

शाम सुहानी

पुष्प महक उठे

रंग बिखरे

-

किससे कहूं

रंगीन हुआ मन

शाम सुहानी

-

शाम की बात

सूरज डूब रहा

मन में तारे

 

रंगीनियां तो बिखेर कर ही जाता है

सूर्य उदित हो रहा हो

अथवा अस्त,

प्रकाश एवं तिमिर

दोनों को लेकर आता है

और

रंगीनियां तो

 बिखेर कर ही जाता है

आगे अपनी-अपनी समझ

कौन किस रूप में लेता है।

यूं ही पार उतरना है

नैया का क्या करना है, अब तो यूं ही पार उतरना है

कुछ डूबेंगे, कुछ तैरेंगे, सब अपनी हिम्मत से करना है

नहीं खड़ा है अब खेवट कोई, नैया पार लगाने को

जान लिया है सब दिया-लिया इस जीवन में ही भरना है

मूर्तियों  की आराधना

 

चित्राधारित रचना

जब मैं अपना शोध कार्य रही थी तब मैंने मूर्तिकला एवं वास्तुकला पर भी कुछ पुस्तकें पढ़ी थीं।

मैंने अपने अध्ययन से यह जाना कि प्रत्येक मूर्ति एवं वास्तु के निर्माण की एक विधि होती है। किसी भी मूर्ति को यूँ ही सजावट के तौर पर कहीं भी बैठकर नहीं बनाया जा सकता यदि उसका निर्माण पूजा-विधि के लिए किया जा रहा है। स्थान, व्यक्ति, निर्माण-सामग्री, निर्माण विधि सब नियम-बद्ध होते हैं।  जो व्यक्ति मूर्ति का निर्माण करता है वह अनेक नियमों का पालन करता है, शाकाहारी एवं बहुत बार उपवास पर भी रहता है जब तक उसका कार्य पूरा नहीं हो जाता।

हमारे धर्म में अनेक देवी-देवताओं की पूजा होती है उनमें गणेश जी भी एक हैं। प्राचीन काल में प्रत्येक देवी-देवता की सम्पूर्ण पूजा विधि का पालन किया जाता था और उसी के अनुसार मूर्ति-निर्माण एवं स्थापना का कार्य।

आज हमारी पूजा-अर्चना व्यापारिक हो गई है। यह सिद्ध है कि प्रत्येक देवी-देवता की पूजा-विधि, मूर्ति-निर्माण विधि, पूजन-सामग्री एवं पूजा-स्थल में उनकी स्थापना विधि अलग-अलग है। किन्तु आज इस पर कोई विचार ही नहीं करता। एक ही धर्म-स्थल पर एक ही कमरे में सारे देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है, जबकि प्राचीन काल में ऐसा नहीं था।

सबसे बड़ी बात यह कि हम यह मानते हैं कि हमारा स्थान ईश्वर के चरणों में है न कि ईश्वर हमारे चरणों में।

हम निरन्तर यह तो देख रहे हैं कि कौन किसे खींच रहा है, कौन देख रहा है किन्तु यह नहीं देख पा रहे कि  गणेश जी की मूर्ति को पैरों में रखकर ले जाया जा रहा है, कैसे होगी फिर उनकी पूजा-आराधना?

   

इस रंगीन शाम में

इस रंगीन शाम में आओ पकड़म-पकड़ाई खेलें

तुम थामो सूरज, मैं चन्दा, फिर नभ के पार चलें

बदली को हम नाव बनायें, राह दिखाएं देखो पंछी

छोड़ो जग-जीवन की चिंताएं,चल हंस-गाकर जी लें

सजावट रह गईं हैं पुस्तकें

दीवाने खास की सजावट बनकर रह गईं हैं पुस्तकें
बन्द अलमारियों की वस्तु बनकर रह गई हैं पुस्तकें
चार दिन में धूल झाड़ने का काम रह गई हैं पुस्तकें
कोई रद्दी में न बेच दे,छुपा कर रखनी पड़ती हैं पुस्तकें।

 

किस युग में जी रहे हो तुम

मेरा रूप तुमने रचा,

सौन्दर्य, श्रृंगार

सब तुमने ही तो दिया।

मेरा सम्पूर्ण व्यक्तित्व

मेरे गुण, या मेरी चमत्कारिता

सब तुम्हारी ही तो देन है।

मुझे तो ठीक से स्मरण भी नहीं

किस युग में, कब-कब

अवतरित हुआ था मैं।

क्यों आया था मैं।

क्या रचा था मैंने इतिहास।

कौन सी कथा, कौन सा युद्ध

और कौन सी लीला।

हां, इतना अवश्य स्मरण है

कि मैंने रचा था एक युग

किन्‍तु समाप्त भी किया था एक युग।

तब से अब तक

हज़ारों-लाखों वर्ष बीत गये।

चकित हूं, यह देखकर

कि तुम अभी भी

उसी युग में जी रहे हो।

वही कल्पनाएं, कपोल-कथाएं

वही माटी, वही बाल-गोपाल

राधा और गोपियां, यशोदा और माखन,

लीला और रास-लीलाएं।

सोचा कभी तुमने

मैंने जब भी

पुन:-पुन: अवतार लिया है

एक नये रूप में, एक नये भाव में

एक नये अर्थ में लिया है।

काल के साथ बदला हूं मैं।

हर बार नये रूप में, नये भाव में

या तुम्हारे शब्दों में कहूं तो

युगानुरूप

नये अवतार में ढाला है मैंने

अपने-आपको।

किन्तु, तुम

आज भी, वहीं के वहीं खड़े हो।

तो इतना जान लो

कि तुम

मेरी आराधना तो करते हो

किन्तु मेरे साथ नहीं हो।

शब्द में अभिव्यक्ति हो

मान देकर प्रतिमान की आशा क्यों करें

दान देकर प्रतिदान की आशा क्यों करें

शब्द में अभिव्यक्ति हो पर भाव भी रहे

विश्वास देकर आभार की आशा क्यों करें

प्रेम-सम्बन्ध

 

दो क्षणिकाएं

******-******

प्रेम-सम्बन्ध

कदम बहके

चेहरा खिले

यूं ही मुस्काये

होंठों पर चुप्पी

पर आंखें

कहां मानें

सब कह डालें।

*-*

प्रेम-सम्बन्ध

मानों बहता दरिया

शीतल समीर

बहकते फूल

खिलता पराग

ठण्डी छांव

आकाश से

बरसते तुषार।

 

समझे बैठे हैं यहां सब अपने को अफ़लातून

जि़न्‍दगी बिना जोड़-जोड़ के कहां चली है

करता सब उपर वाला हमारी कहां चली है

समझे बैठे हैं यहां सब अपने को अफ़लातून

इसी मैं-मैं के चक्‍कर में सबकी अड़ी पड़ी है

समझा रहे हैं राजाजी

वीरता दिखा रहे मंच पर आज राजाजी

हाथ उठा अपना ही गुणगान कर रहे हैं राजाजी

धर्म-कर्म, जाति-पाति के नाम पर मत देना

बस इतना ही तो समझा रहे हैं राजाजी।

अपनी आवाज़ अपने को सुनाती हूं मैं

मन के द्वार

खटखटाती हूं मैं।

अपनी आवाज़

अपने को सुनाती हूं मैं।

द्वार पर बैठी

अपने-आपसे

बतियाती हूं मैं।

इस एकान्त में

अपने अकेलपन को

सहलाती हूं मैं।

द्वार उन्मुक्त हों या बन्द,

कहानी कहां बदलती है जीवन की,

सहेजती हूं कुछ स्मृतियां रंगों में,

कुछ को रंग देती हूं,

आकार देती हूं,

सौन्दर्य और आभास देती हूं।

जीवन का, नवजीवन का

भास देती हूं।

 

कुर्सियां

भूल हो गई मुझसे

मैं पूछ बैठी

कुर्सी की

चार टांगें क्यों होती हैं?

हम आराम से

दो पैरों पर चलकर

जीवन बिता लेते हैं

तो कुर्सी की

चार टांगें क्यों होती हैं?

कुर्सियां झूलती हैं।

कुर्सियां झूमती हैं।

कुर्सियां नाचती हैं।

कुर्सियां घूमती हैं।

चेहरे बदलती हैं,

आकार-प्रकार बांटती हैं,

पहियों पर दौड़ती हैं।

अनोखी होती हैं कुर्सियां।

किन्तु

चार टांगें क्यों होती हैं?

 

जिनसे पूछा

वे रुष्ट हुए

बोले,

तुम्हें अपनी दो

सलामत चाहिए कि नहीं !

दो और नहीं मिलेंगीं

और कुर्सी की तो

कभी भी नहीं मिलेंगी।

मैं डर गई

और मैंने कहा

कि मैं दो पर ही ठीक हूँ

मुझे  चौपाया  नहीं बनना।

 

प्यार के बाज़ार

प्यार के बाज़ार में अपनापन ढूॅंढने निकले थे

सबकी कीमत थी वहाॅं, मॅंहगे-मॅंहगे बिकते थे

चेहरों पर कृत्रिम मुस्कान लिए सब बैठे थे

जाकर देखा तो प्यार के झूठे वादे पलते थे

कैसे जायें नदिया पार

ठहरी-ठहरी-सी, रुकी-रुकी-सी जल की लहरें

कश्ती को थामे बैठीं, मानों उसे रोक रही लहरें

बिन मांझी कहाॅं जायेगी, कैसे जायें नदिया पार

तरल-तरल भावों से, मानों कह रही हैं ये लहरें

सागर का मन

पूर्णिमा के चांद को देख

चंचल हो उठता है

सागर का मन,

उत्ताल तरंगें

उमड़ती हैं

उसके मन में,

वैसे ही सीमा-विहीन है

सागर का मन।

ऐसे में

और  बिखर-बिखर जाता है,

कौन समझा है यहां।

 

 

ज़िन्दगी देती सबक है

सुना है

ज़िन्दगी देती सबक है

मुझे कुछ ज़्यादा ही दे दिया।

मांगा कुछ था

भेज कुछ और दिया।

जाने किस-किससे

मेरा पार्सल बदल दिया।

कीमत वसूलने में

ज़रा भी ढील नहीं की

सामान बहुत हल्का भेज दिया।

दाना-दाना बिखर गया

समेट सकी

शिकायत कक्ष भी

बन्द कर दिया,

उल्टे मुझे ही कटघरे में

खड़ा कर दिया।