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खींच-तान में मन उलझा रहता है

आशाओं का संसार बसा है, मन आतुर रहता है

यह भी ले ले, वह भी ले ले, पल-पल ये ही कहता है

क्या छोड़ें, क्या लेंगे, और क्या मिलना है किसे पता

बस इसी खींच-तान में जीवन-भर मन उलझा रहता है

मेरे हिस्से का सूरज

कैसे कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज खा भी गये।

यूं देखा जाये

तो रोशनी पर सबका हक़ है।

पर सबके पास

अपने-अपने हक का

सूरज भी तो होता है।

फ़िर, क्यों, कैसे

कुछ लोग

मेरे हिस्से का सूरज खा गये।

बस एक बार

इतना ही समझना चाहती हूं

कि गलती मेरी थी कहीं,

या फिर

लोगों ने मेरे हक का सूरज

मुझसे छीन लिया।

शायद गलती मेरी ही थी।

बिना सोचे-समझे

रोशनियां बांटने निकल पड़ी मैं।

यह जानते हुए भी

कि सबके पास

अपना-अपना सूरज भी है।

बस बात इतनी-सी

कि अपने सूरज की रोशनी पाने के लिए

कुछ मेहनत करनी पड़ती है,

उठाने पड़ते हैं कष्ट,

झेलनी पड़ती हैं समस्याएं।

पर जब यूं ही

कुछ रोशनियां मिल जायें,

तो क्यों अपने सूरज को जलाया जाये।

जब मैं नहीं समझ पाई,

इतनी-सी बात।

तो होना यही था मेरे साथ,

कि कुछ लोग

मेरे हिस्से का सूरज खा गये।

 

अनजान राही

एक अनजान राही से

एक छोटी-सी

मुस्कान का आदान-प्रदान।

ज़रा-सा रुकना,

झिझकना,

और देखते-देखते

चले जाना।

अनायास ही

दूर हो जाती है

जीवन की उदासी

मिलता है असीम आनन्द।

 

जिए एक नई विधा छन्दमुक्त ग़ज़ल

आज ग़ज़ल लिखने के लिए एक मिसरा मिला

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जाम नजरों से मुझको पिलाओ न तुम

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अब हम गज़ल तो लिखते नहीं

तो कौन कहता है कि मिसरे पर छन्दमुक्त रचना नहीं लिखी जा सकती

लीजिए एक नई विधा छन्दमुक्त ग़ज़ल

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जाम नजरों से मुझको पिलाओ न तुम

कुछ बढ़िया से कट ग्लास लेकर आओ तुम।

अब तो लाॅक डाउन भी खुल गया,

गिलास न होने के

बहाने न बनाओ तुम।

गर जाम नज़रों से पिलाओगे,

तो आंख से आंख  कैसे मिलाओगे तुम।

किसी को टेढ़ी नज़र से देखने

का मज़ा कैसे पाओगे तुम।

आंखों में आंखें डालकर

बात करने का मज़ा ही अलग है,

उसे कैसे छीन पाओगे तुम।

नज़रें फे़रकर कभी निकलेंगे

तो आंख से मोती कैसे लुढ़काओगे तुम।

कभी आंख झुकाओगे,

कभी आंख ही आंख में शरमाओगे,

कभी आंख बन्द कर,

कैसे फिर सपनों में आओगे तुम।

और कहीं नशेमन में आंख मूंद ली

तो आंसुओं की जगह

बह रहे सोमरस को दुनिया से

कैसे छुपाओगे तुम।

कभी कांटों को सहेजकर देखना

फूलों का सौन्दर्य तो बस क्षणिक होता है

रस रंग गंध सबका क्षरण होता है

कभी कांटों को सहेजकर देखना

जीवन भर का अक्षुण्ण साथ होता है

जीवन-दर्शन दे जाते हैं ये पत्थर

किसी छैनी हथौड़ी के प्रहार से नहीं तराशे जाते हैं ये पत्थर

प्रकृति के प्यार मनुहार, धार धार से तराशे जाते हैं ये पत्थर

यूं तो  ठोकरे खा-खाकर भी जीवन संवर-निखर जाता है

इस संतुलन को निहारती हूं तो जीवन डांवाडोल दिखाई देता है
मैं भाव-संतुलन नहीं कर पाती, जीवन-दर्शन दे जाते हैं ये पत्थर

देखो तो सूर्य भी निहारता है जब आकार ले लेते हैं ये पत्थर 

ज़िन्दगी जीने के तरीके

ज़िन्दगी जीने के

तरीके

यूॅं तो मुझे

ज़िन्दगी जीने के

तरीके बहुत आते हैं

किन्तु क्या करुॅं मैं

उदाहरण और उलाहने

बहुत सताते हैं।

 

अपनापन आजमाकर देखें

चलो आज यहां ही सबका अपनापन आजमाकर देखें

मेरी तुकबन्दी पर वाह वाह की अम्बार लगाकर देखें

न मात्रा, न मापनी, न गणना, छन्द का ज्ञान है मुझे

मेरे तथाकथित मुक्तक की ज़रा हवा निकालकर देखें

 

मैं बहुत बातें करता हूं

मम्मी मुझको गुस्सा करतीं

पापा भी हैं डांट पिलाते

मैं बहुत बातें करता हूं

कहते-कहते हैं थक जाते

चिड़िया चीं-चीं-ची-चीं करती

कौआ कां-कां-कां-कां करता

टाॅमी दिन भर भौं-भौं करता

उनको क्यों नहीं कुछ भी कहते

 

 

हर चीज़ मर गई अगर एहसास मर गया

 

मेरी आंखों के सामने

एक चिड़िया तार में फंसी,

उलझी-उलझी,

चीं-चीं करती

धीरे-धीरे मरती रही,

और हम दूर खड़े बेबस

शायद तमाशबीन से

देख रहे थे उसे

वैसे ही

धीरे-धीरे मरते।

 

तभी

चिड़ियों का एक दल

कहीं दूर से

उड़ता आया,

और उनकी चिड़चिडाहट से

गगन गूंज उठा,

रोंगटे खड़े हो गये हमारे,

और दिल दहल गया।

 

उनके प्रयास विफ़ल थे

किन्तु उनका दर्द

धरा और गगन को भेदकर

चीत्कार कर उठा था।

 

कुछ देर तक हम

देखते रहे, देखते रहे,

चिड़िया मरती रही,

चिड़ियां रूदन करती रहीं,

इतने में ही

कहीं से एक बाज आया,

चिड़ियों के दल को भेदता,

तार में फ़ंसी चिड़िया के पैर खींचे

और ले उड़ा,

कुछ देर  चर्चा  करते रहे   हम

फिर हम भीतर आकर

टी. वी. पर

दंगों के समाचारों का

आनन्द लेने लगे।

 

क्रूरता की कोई सीमा नहीं ।

 

हर चीज़ मर गई

अगर एहसास मर गया।

आंख को धुंधला अहं भी कर देता है

लोग, अंधेरे से घबराते हैं

मुझे, उजालों से डर लगता है।

प्रकाश देखती हूं

मन घबराने लगता है

सूरज निकलता है

आंखें चौंधिया जाती हैं

ज़्यादा रोशनी

आंख को अंधा कर देती है।

फिर

पैर ठोकर खाने लगते हैं,

गिर भी सकती हूं,

चोट भी लग सकती है,

और जान भी जा सकती है।

किन्तु जब अंधेरा होता है,

तब आंखें फाड़-फाड़ कर देखने का प्रयास

मुझे रास्ता दिखाने लगता है।

गिरने का भय नहीं रहता।

और उजाले की अपेक्षा

कहीं ज़्यादा दिखाई देने लगता है।

 

आंखें

अभ्यस्त हो जाती हैं

नये-नये पथ खोजने की

डरती नहीं

पैर भी नहीं डगमगाते

वे जान जाते हैं

आगे अवरोध ही होंगे

पत्थर ही नहीं, गढ्ढे भी होंगे।

पर अंधेरे की अभ्यस्त आंखें

प्रकाश की आंखों की तरह

चौंधिया नहीं जातीं।

राहों को तलाशती

सही राह पहचानतीं

ठोकर खाकर भी आगे बढ़ती हैं

प्रकाश की आंखों की तरह

एक अहं से नहीं भर जातीं।

 

आंख को धुंधला

केवल आंसू ही नहीं करते

अहं भी कर देता है।

वैसे मैं तुम्हें यह भी बता दूं

कि ज़्यादा प्रकाश

आंख के आगे अंधेरा कर देता है

और ज़्यादा अंधेरा

आंख को रोशन

 

अत:

मैं रोशनी का अंधापन नहीं चाहती

मुझे

अंधेरे की नज़र चाहिए

जो रात में दिन का उजाला खोज सके

जो अंधेरे में

प्रकाश की किरणें बो सके

और प्रकाश के अंधों को

अंधेरे की तलाश

और उसकी पहचान बता सके।

 

अपनी कहानियाँ आप रचते हैं

पुस्तकों में लिखते-लिखते

भाव साकार होने लगे।

शब्द आकार लेने लगे।

मन के भाव नर्तन करने लगे।

आशाओं के अश्व

दौड़ने लगे।

सही-गलत परखने लगे।

कल्पना की आकृतियां

सजीव होने लगीं,

लेखन से विलग

अपनी बात कहने लगीं।

पूछने लगीं, जांचने लगीं,

सत्य-असत्य परखने लगीं।

अंधेरे से रोशनियों में

चलने लगीं।

हाथ थाम आगे बढ़ने लगीं।

चल, इस ठहरी, सहमी

दुनिया से अलग चलते हैं

बनी-बनाई, अजनबी

कहानियों से बाहर निकलते हैं,

अपनी कहानियाँ आप रचते हैं।

 

ज़िन्दगी एक बेनाम शीर्षक

समय के साथ कथाएं इतिहास बनकर रह गईं

कुछ पढ़ी, कुछ अनपढ़ी धुंधली होती चली गईं

न अन्त मिला न आमुख रहा, अर्थ सब खो गये

बस ज़िन्दगी एक बेनाम शीर्षक बनकर रह गई

जामुन लटके पेड़ पर

जामुन लटके पेड़ पर

ऊंचे-ऊंचे रहते।

और हम देखो

आस लगाये

नीचे बैठै रहते।

आंधी आये, हवा चले

तो हम भी कुछ खायें।

एक डाली मिल गई नीची

हमने झूले झूले।

जामुन बरसे

हमने भर-भर लूटे।

माली आता देखकर

हम सब सरपट भागे।

चोरी-चोरी घर से
कोई लाया नमक

तो कोई लाया मिर्ची।

जिसको जितने मिल गये

छीन-छीनकर खाये।

साफ़ किया मुंह अच्छे-से

और भोले-भाले बनकर

घर आये।

मां ने “रंगे हाथ”

पकड़ी हमारी चोरी।

मां के हाथ आया डंडा

हम आगे-आगे

मां पीछे-पीछे भागे।

थक-हार कर बैठ गई मां।

 

स्मृतियों के खण्डहर

कुछ

अनचाही स्मृतियाँ

कब खंडहर बन जाती हैं

पता ही नहीं लग पाता

और हम

उन्हीं खंडहरों पर

साल-दर-साल

लीपा-पोती

करते रहते हैं

अन्दर-ही-अन्दर

दीमक पालते रहते हैं

देखने में लगती हैं

ऊँची मीनारें

किन्तु एक हाथ से

ढह जाती हैं।

प्रसन्न रहते हैं हम

इन खंडहरों के बारे में

बात करते हुए

सुनहरे अतीत के साक्षी

और इस अतीत को लेकर

हम इतने

भ्रमित रहते हैं

कि वर्तमान की

रोशनियों को

नकार बैठते हैं।

 

 

 

एक साईकिल दिलवा दो न

ए जी,

मुझको भी

एक साईकिल दिलवा दो न।

कार-वार का क्या करना है,

यू. पी. से दिल्ली तक

ही तो फ़र्राटे भरना है।

बस उसमें 

आरक्षण का ए.सी. लगवा देना।

लुभावने वादों की

दो-चार सीटें बनवा देना।

कुछ लैपटाप लटका देना।

कुछ हवा-भवा भरवा देना।

एक-ठौं पत्रकार बिठा देना।

कुछ पूरी-भाजी बनवा देना।

हां,

एक कुर्सी ज़रूर रखवा देना,

उस पर रस्सी बंधवा देना।

और

लौटे में देर हो जाये

तो फुनवा घुमा लेना।

ए जी,

एक ठौ साईकिल दिलवा दो न।

अहं सर्वत्र रचयिते : एक व्यंग्य

हम कविता लिखते हैं।

कविता को गज़ल, गज़ल को गीत, गीत को नवगीत, नवगीत को मुक्त छन्द, मुक्त छन्द को मुक्तक और चतुष्पदी बनाना जानते हैं। और इन सबको गद्य की विविध विधाओं में परिवर्तित करना भी जानते हैं।

अर्थात् , मैं ही लेखक हूँ, मैं ही कवि, गीतकार, गज़लकार, साहित्यकार, गद्य-पद्य की रचयिता, , प्रकाशक, मुद्रक, विक्रेता, क्रेता, आलोचक, समीक्षक भी मैं ही हूँ।

मैं ही संचालक हूँ, मैं ही प्रशासक हूँ।

सब मंचों पर मैं ही हूँ।

इस हेतु समय-समय पर हम कार्यशालाएँ भी आयोजित करते हैं।

अहं सर्वत्र रचयिते।

 

  

एक अपनापन यूं ही

सुबह-शाम मिलते रहिए

दुआ-सलाम करते रहिए

बुलाते रहिए अपने  घर

काफ़ी-चाय पिलाते रहिए

क्‍यों करें किसी से गिले

कांटों के संग फूल खिले

अनजाने कुछ मीत मिले

सारी बातें आनी जानी हैं

क्‍यों करें किसी से गिले

नहीं समझ पाते स्याह सफ़ेद में अन्तर

गिरगिट की तरह

यहां रंग बदलते हैं लोग।

बस,

बात इतनी सी

कि रंग

कोई और चढ़ा होता है

दिखाई और देता है।

समय पर

हम कहां समझ पाते हैं

स्याह-सफ़ेद में अन्तर।

कब कौन

किस रंग से पुता है

हम देख ही नहीं पाते।

कब कौन

किस रंग में आ जाये

हम जान ही नहीं पाते।

अक्सर काले चश्मे चढ़ाकर

सफ़ेदी ढूंढने निकलते हैं।

रंगों से पुती है दुनिया,

कब किसका रंग उतरे,

और किस रंग का परदा चढ़ जाये

हम कहां जान पाते हैं।

माँ का प्यार

माँ का अँक

एक सुरक्षा-कवच

कभी न छूटे

कभी न टूटे

न हो विलग।

 

माँ के प्राण

किसी तोते समान

बसते हैं

अपने शिशु में

कभी न हों  विलग।

जीवन की आस

बस तेरे साथ

जीवन यूँ ही बीते

तेरी साँस मेरी आस।

 

हादसे तो होते ही रहते हैं

2008 में भगदड़ मच जाने से करीब 145 लोगा की जान चली गई थी

नैना देवी में हादसा हुआ। श्रावण मेला था। समाचारों की विश्वसनीयता के अनुसार वहां लगभग बीस हज़ार लोग उपस्थित थे। पहाड़ी स्थान। उबड़-खाबड़, टेढ़े-मेढ़े संकरे रास्ते। सावन का महीना। मूसलाधार बारिश। ऐसी परिस्थितियों में एक हादसा  हुआ। क्यों हुआ कोई नहीं जानता। कभी जांच समिति की रिपोर्ट आयेगी तब भी किसी को पता नहीं लगेगा।

     किन्तु जैसा कि कहा गया कि शायद कोई अफवाह फैली कि पत्थर खिसक रहे हैं अथवा रेलिंग टूटी। यह भी कहा गया कि कुछ लोगों ने रेंलिंग से मन्दिर की छत पर चढ़ने का प्रयास किया तब यह हादसा हुआ।

      किन्तु कारण कोई भी रहा हो, हादसा तो हो ही गया। वैसे भी ऐसी परिस्थितियों  मंे हादसों की सम्भावनाएँ बनी ही रहती हैं। किन्तु ऐसी ही परिस्थितियों में आम आदमी की क्या भूमिका हो सकती है अथवा होनी चाहिए। जैसा कि कहा गया वहां बीस हज़ार दर्शनार्थी थे। उनके अतिरिक्त स्थानीय निवासी, पंडित-पुजारी; मार्ग में दुकानें-घर एवं भंडारों आदि में भी सैंकड़ों लोग रहे होंगे। बीस हज़ार में से लगभग एक सौ पचास लोग कुचल कर मारे गये और लगभग दो सौ लोग घायल हुए। अर्थात्  उसके बाद भी वहां सुरक्षित बच गये लगभग बीस हज़ार लोग थे। किन्तु जैसा कि ऐसी परिस्थितियों में सदैव होता आया है उन हताहत लोगों की व्यवस्था के लिए पुलिस नहीं आई, सरकार ने कुछ नहीं किया, व्यवस्था नहीं थी, चिकित्सा सुविधाएँ नहीं थीं, सहायता नहीं मिली, जो भी हुआ बहुत देर से हुआ, पर्याप्त नहीं हुआ, यह नहीं हुआ, वह नहीं हुआ; आदि -इत्यादि शिकायतें समाचार चैनलों, समाचार-पत्रों एवं लोगों ने की।

       किन्तु प्रश्न यह है कि हादसा क्यों हुआ और हादसे के बाद की परिस्थितियों के लिए कौन उत्तरदायी है ? निश्चित रूप से इस हादसे के लिए वहां उपस्थित बीस हज़ार लोग ही उत्तरदायी हैं। यह कोई प्राकृतिक हादसा नहीं था, उन्हीं बीस हज़ार लोगों द्वारा उत्पे्ररित हादसा था यह। लोग मंदिरों में दर्शनों के लिए भक्ति-भाव के साथ जाते हैं। सत्य, ईमानदारी, प्रेम, सेवाभाव का पाठ पढ़ते हैं। ढेर सारे मंत्र, सूक्तियां, चालीसे, श्लोक कंठस्थ होते हैं। आगे बढ़ते हुए माता का जयकारा लगाते जाते हैं। किन्तु एक समय और एक सीमा के बाद सब भूल जाते हैं। ऐसे अवसरों पर सब जल्दी में रहते हैं। कोई भी कतार में, व्यवस्था में बना रहना नहीं चाहता। कतार तोड़कर, पैसे देकर, गलत रास्तों से हम लोग आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। जहां दो हज़ार का स्थान है वहां हम बीस हज़ार या दो लाख एकत्र हो जाते हैं फिर कहते हैं हादसा हो गया। सरकार की गलती है, पुलिस नहीं थी, व्यवस्था नहीं थी। सड़कंे ठीक नहीं थीं। अब सरकार को चाहिए कि नैना देवी जैसे पहाड़ी रास्तों पर राजपथ का निर्माण करवाये। किन्तु इस चर्चा से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जो  150 लोग मारे गये और दो सौ घायल हुए उन्हें किसने मारा और किसके कारण ये लोग घायल हुए? निश्चय ही, वे स्वयँ अथवा वहां उपस्थित बीस हज़ार लोग ही इन सबकी मौत के अपराधी हैं। उपरान्त हादसे के सब लोग एक-दूसरे को रौंदकर घर की ओर जान बचाकर भाग चले। किसी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा कि उन्होंने किसके सिर अथवा पीठ पर  पैर रखकर अपनी जान बचाई है। सम्भव है अपने ही माता-पिता, भाई-बहन अथवा किसी अन्य परिचित को रौंदकर ही वे अपने घर सुरक्षित पहुंचे हों। जो गिर गये उन्हें किसी ने नहीं उठाया क्योंकि यह तो सरकार का, पुलिस का, स्वयंसेवकों का कार्य है आम आदमी का नहीं, हमारा-आपका नहीं। हम-आप जो वहां बीस हज़ार की भीड़ के रूप में उपस्थित थे। किसी की जान बचाने का, घायल को उठाने का, मरे को मरघट पंहुचाने का हमारा दायित्व नहीं है। हम भीड़ बनकर किसी की जान तो ले सकते हैं, किन्तु किसी की जान नहीं बचा सकते। आग लगा सकते हैं, गाड़ियां जला सकते हैं, हत्या कर सकते हैं,  दुष्कर्म, लूट-पाट कर सकते हैं किन्तु उन व्यवस्थाओं एवं प्रबन्धनों में हाथ नहीं बंटा सकते जहां होम करते हाथ जलते हों। जहाँ कोई उपलब्धि नहीं हैं वहां कुछ क्यों किया जाये।

  भंडारों में लाखों रुपये व्यय करके, देसी घी की रोटियां खिला सकते हैं, करोड़ों रुपयों की मूर्तियाँ,छत्र, सिंहासन दान कर सकते हैं, सड़क किनारे मार्ग अवरुद्ध करते हुए छबील लगा सकते हैं, भोजन बांट सकते हैं किन्तु ऐसे भीड़ वाले स्थानों पर होने वाली आकस्मिक दुर्घटनाओं से निपटने के लिए आपदा-प्रबन्धन में अपना योगदान देने में हम कतरा जाते हैं। धर्म के नाम पर दान मांगने वाले प्रायः आपका द्वार खटखटाते होंगे, मंदिरों के निर्माण के लिए, भगवती जागरण, जगराता, भंडारा, राम-लीला के लिए रसीदें काट कर पैसा मांगने में युवा से लेकर वृद्धों तक को कभी कोई संकोच नहीं होता, किन्तु किसी अस्पताल के निर्माण के लिए, शिक्षा-संस्थानों हेतु, भीड़-भीड़ वाले स्थानों पर आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था हेतु एक आम आदमी का तो क्या किसी बड़ी से बड़ी धार्मिक संस्था को  भी कभी अपना महत्त योगदान प्रदान करते कभी नहीं देखा गया। किसी भी मन्दिर की सीढ़ियां चढ़ते जाईये और उस सीढ़ी पर किसी की स्मृति में बनवाने वाले का तथा जिसके नाम पर सीढ़ी बनवाई गई है, का नाम पढ़ते जाईये। ऐसे ही कितने नाम आपको द्वारों, पंखों, मार्गों आदि पर उकेरित भी मिल जायेंगे। किन्तु मैंने आज तक किसी अस्पताल अथवा विद्यालय में इस तरह के दानी का नाम नहीं देखा।

हम भीड़ बनकर तमाशा बना कते हैं, तमाशा देख सकते हैं, तमाशे में किसी को झुलसता देखकर आंखें मूंद लेते हैं क्योंकि यह तो सरकार का काम है।

 

  

नदिया की धार-सी टेढ़ी-मेढ़ी बहती है ज़िन्दगी

जीवन का आनन्द है कुछ लाड़ में, कुछ तकरार में

अपनों से कभी न कोई गिला, न जीत में न हार में

नदिया की धार-सी टेढ़ी-मेढ़ी बहती है ज़िन्दगी

रूठेंगे अगर कभी तो मना ही लेंगे हम प्यार से

सदानीरा अमृत-जल- नदियाँ

नदियों के अब नाम रह गये

नदियों के अब कहाँ धाम रह गये।

गंगा, यमुना हो या सरस्वती

बातों की ही बात रह गये।

कभी पूजा करते थे

नदी-नीर को

अब कहते हैं

गंदे नाले के ये धाम रह गये।

कृष्ण से जुड़ी कथाएँ

मन मोहती हैं

किन्तु जब देखें

यमुना का दूषित जल

तो मन में कहाँ वे भाव रह गये।

पहले मैली कर लेते

कचरा भर-भरकर,

फिर अरबों-खरबों की

साफ़-सफ़ाई पर करते

बात रह गये।

कहते-कहते दिल दुखता है

पर

सदानीरा अमृत-जल-नदियों के तो

अब बस नाम ही नाम रह गये।

हम तो रह गये पांच जमाती

क्या बतलाएं आज अपनी पीड़ा, टीचर मार-मार रही पढ़ाती

घर आने पर मां कहती गृह कार्य दिखला, बेलन मार लिखाती

पढ़ ले, पढ़ ले,कोई कहता टीचर बन ले, कोई कहता डाक्टर

नहीं ककहरा समझ में आया, हम तो रह गये पांच जमाती

पर प्यास तो बुझानी है

झुलसते हैं पांव, सीजता है मन, तपता है सूरज, पर प्यास तो बुझानी है

न कोई प्रतियोगिता, न जीवटता, विवशता है हमारी, बस इतनी कहानी है

इसी आवागमन में बीत जाता है सारा जीवन, न कोई यहां समाधान सुझाये

और भी पहलू हैं जिन्दगी के, न जानें हम, बस इतनी सी बात बतानी है

आकाश में अठखेलियां करते देखो बादल

आकाश में अठखेलियां करते देखो बादल

ज्‍यों मां से हाथ छुड़ाकर भागे देखो बादल

डांट पड़ी तो रो दिये,मां का आंचल भीगा

शरारती-से,जाने कहां गये ज़रा देखो बादल

ये कैसा सावन ये कैसा पानी

सावन की बरसे बदरिया

सोच-सोच मन घबराये।

बूंदें कब

जल-प्लावन बन जायेंगी

कब बहेगी धारा

सोच-सोच मन डर जाये।

-

नदिया का पानी

तट-बन्धों से जब टकराए

कब टूटेंगी सीमाएं

रात-रात नींद आये।

-

बिजली चमके

देख रहे, लाखों घर डूबे

कितनी गई जानें

मन सहम-सहम जाये।

-

कब आसमान से आयेगी विपदा

कौन रहेगा, कौन जायेगा

हाथों से हाथ छूट रहे

जाने ये कैसे दिन आये।

.

पुल टूटू, राहें बिखर गईं

खेतों में सागर लहराया

सूनी आंखों से ताक रहा किसान

देख-देख मन भर आये।

.

सिर पर छत रही

पैरों के नीचे धरा रही

कहां जा रहे, कहां रहे

कंधों पर लादे ज़िन्दगी

जाने हम किस राह  निकल आये।

-

कैसी विपदा ये आई

हाथ बांध हम खड़े रह गये

लूट ले गया घर-घर को

जल का तांडव,

कब निकलेगा पानी

कब लौटेंगे जीवन में

नहीं, नहीं, नहीं, हम समझ पाये।

 

 

विरोध से डरते हैं

सहनशीलता के दिखावे की आदत-सी हो गई है

शालीनता के नाम पर चुप्पी की बात-सी हो गई है

विरोध से डरते हैं, मुस्कुराहट छाप ली है चेहरों पर

सूखे फूलों में खुशबू ढूंढने की आदत-सी हो गई है।

इतिहास हमारा

इतिहास हमारा स्वर्णिम था, या था समस्याओं का काल

किसने देखा, किसने जाना, बस पढ़ा-सुना कुछ हाल

गल्प कथाओं से भरा, सत्य है या कल्पना कौन कहे

यूँ ही लड़ते-फिरते हैं, निकाल रहे बस बाल की खाल