थक गई हूॅं मैं अब
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सम्बन्ध एक पुल होते हैं
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रिश्ते भी मौसम से हो गये हैं
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तेरा साथ
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स्मृतियां सदैव मधुर नहीं होतीं
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अपनेपन की कामना
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वहम की दीवारें
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ज़िन्दगी सहज लगने लगी है
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अपनों की यादें
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धागों का रिश्ता
कहने को कच्चे धागों का रिश्ता, पर मज़बूत बड़ा होता है

निःस्वार्थ भावों से जुड़ा यह रिश्ता बहुत अनमोल होता है

भाई यादों में जीता है जब बहना दूर चली चली जाती है

राखी-दूज पर मिलने आती है, तब आनन्द दूना होता है।

माँ का प्यार
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घर की पूरी खुशियाँ
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अपनेपन को समझो

रिश्तों में जब बिखराव लगे तो अपनी सीमाएं समझो

किसी और की गलती से पहले अपनी गलती परखो

इससे पहले कि डोरी हाथ से छूटती, टूटती दिखे

कुछ झुक जाओ, कुछ मना लो, अपनेपन को समझो

जीवन की डगर चल रही
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मेरे मित्र
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शब्द नहीं, भाव चाहिए
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यह रिश्ते

माता-पिता के लिए बच्चे वरदान होते हैं।

बच्चों के लिए माता-पिता सरताज होते हैं।

इन रिश्तों में गंगा-यमुना-सी पवित्र धारा बहती है,

यह रिश्ते मानों जीवन का मधुर साज़ होते हैं।

 

रिश्तों में

माता-पिता न मांगें कभी बच्चों से प्रतिदान।

नेह, प्रेम, अपनापन, सुरक्षा, नहीं कोई एहसान।

इन रिश्तों में लेन-देन की तुला नहीं रहती,

बदले में न मांगें बच्चों से कभी बलिदान।

 

बस नेह मांगती है

कोई मांग नहीं करती बस नेह मांगती है बहन।

आशीष देती, सुख मांगती, भाई के लिए बहन।

दुख-सुख में साथी, पर जीवन अधूरा लगता है,

जब भाई भाव नहीं समझता, तब रोती है बहन।

 

रिश्तों का असमंजस
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निरन्तर बढ़ रही हैं दूरियां

कुछ शहरों की हैं दूरियां, कुछ काम-काज की दूरियां

मेल-मिलाप कैसे बने, निरन्तर बढ़ रही हैं दूरियां

परिवार निरन्तर छिटक रहे, दूर-पार सब जा रहे,

तकनीक आज मिटा रही हम सबके बीच की दूरियां

 

कहानी टूटे-बिखरे रिश्तों की
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अपनी कमज़ोरियों को बिखेरना मत
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मां तो बस मां होती है
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अधूरा लगता है जीवन जब सिर पर मां का हाथ नहीं होता

मां का कोई नाम नहीं होता, मां का कोई दाम नहीं होता

मां तो बस मां होती है उसका कोई अलग पता नहीं होता

घर के कण-कण में, सहज-सहज अनदेखी-अनबोली मां

अधूरा लगता है जीवन जब सिर पर मां का हाथ नहीं होता

क्‍यों करें किसी से गिले

कांटों के संग फूल खिले

अनजाने कुछ मीत मिले

सारी बातें आनी जानी हैं

क्‍यों करें किसी से गिले

ज़िन्दगी में मुश्किल से सम्हलते हैं रिश्ते

वे चुप-चुप थे ज़रा, हमने पूछा कई बार, क्या हुआ है

यूं ही छोटी-छोटी बातों पर भी कभी कोई गैर हुआ है

ज़िन्दगी में मुश्किल से सम्हलते हैं कुछ अच्छे रिश्ते

सबसे हंस-बोलकर समय बीते, ऐसा  कब-कब हुआ है

समय ने बदली है परिवार की परिल्पना

समय ने बदली है परिवार की परिल्पना, रक्त-सम्बन्ध बिखर गये

जहां मिले अपनापन, सुख-दुख हो साझा, वहीं मन-मीत मिल गये

झूठे-रूठे-बिगड़े सम्बन्धों को कब तक ढो-ढोकर जी पायेंगे

कौन है अपना, कौन पराया, स्वार्थान्धता में यहां सब बदल गये

कच्चे धागों से हैं जीवन के रिश्ते

हर दिन रक्षा बन्धन का-सा हो जीवन में

हर पल सुरक्षा का एहसास हो जीवन में

कच्चे धागों से बंधे हैं जीवन के सब रिश्ते

इन धागों में विश्वास का एहसास हो जीवन में

 

जब मांगो हाथ मदद का तब छिपने के स्थान बहुत हैं

बातों में, घातों में, शूरवीर, बलशाली, बलवान,  बहुत हैं

जब मांगो हाथ मदद का, तब छिपने के स्थान बहुत हैं

कैसे जाना, कितना जाना, किसको माना था अपना,

क्या बतलाएं, कैसे बतलाएं, वैसे लेने को तो नाम बहुत है