सुना है कुछ लोग
उड़ती चिड़िया के
पर गिन लिया करते हैं।
कौन हैं वे लोग
जो उड़ती चिड़िया के
पर गिन लिया करते हैं।
क्या वे
कोई और काम भी करते हैं,
अथवा बस,
उड़ती चिड़िया के
पर ही गिनते रहते हैं।
कौन उड़ा रहा है चिड़िया ?
कितनी चिड़िया उड़ रही हैं ?
जिनके पर गिने जा रहे हैं ?
पहले पकड़ते हैं,
पिंजरे में
पालन-पोषण करते हैं।
लाड़-प्यार जताते हैं।
कुछ पर काट देते हैं,
कि चिड़िया उड़ न जाये।
फिर एक दिन उकता जाते हैं,
और छोड़ देते हैं उसे
आधी-अधूरी उड़ानों के लिए।
फिर अपना अनुभव बखानते हैं,
हम तो उड़ती चिड़िया के
पर गिन लेते हैं।
सच में ही
बहुत गुणी हैं ये लोग।
Write a comment
More Articles
भाईयों को भारी पड़ती थी मां।
भाईयों को भारी पड़ती थी मां।
पता नहीं क्यों
भाईयों से डरती थी मां।
मरने पर कौन देगा कंधा
बस यही सोचा करती थी मां।
जीते-जी रोटी दी
या कभी पिलाया पानी
बात होती तो टाल जाती थी मां।
जो कुछ है घर में
चाहे टूटा-फूटा या उखड़ा-बिखरा
सब भाइयों का है,
कहती थी मां।
बेटा-बेटा कहती फ़िरती थी
पर आस बस
बेटियों से ही करती थी मां।
राखी-टीके बोझ लगते थे
लगते थे नौटंकी
क्या रखा है इसमें
कहते थे भाई ।
क्या देगी, क्या लाई
बस यही पूछा करते थे भाई।
पर दुनिया कहती थी
बेचारे होते हैं वे भाई
जिनके सिर पर होता है
अविवाहित बहनों का बोझा
इसी कारण शादी करने
से डरती थी मैं।
मां-बाप की सेवा करना
लड़कियों का भी दायित्व होता है
यह बात समझाते थे भाई
लेकिन घर पर कोई अधिकार नहीं
ये भी बतलाते थे भाईA
एक दूर देश में चला गया
एक रहकर भी तो कहां रहा।
सोचा करती थी मैं अक्सर
क्या ऐसे ही होते हैं भाई।
Share Me
सूर्य उत्तरायण हो गये आज
सूर्यदेव उत्तरायण हो गये आज।
दिन बड़े होने लगे,रातें छोटी।
प्रकाश बढ़ने लगता है
और अंधेरी रातों का डर
कम होने लगता है,
और प्रकाश के साथ
सकारात्मकता का बोध
होने लगता है।
कथा है कि
भीष्म पितामह ने
प्रतीक्षा की थी
देह-त्याग के लिए
सूर्य के उत्तारयण की।
हमारे ग्रंथ कहते हैं
कि उत्तरायण के प्रकाश में
देह-त्याग करने वालों को
पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता,
मुक्त हो जाते हैं वे
जन्म-मरण के जाल से।
.
मैं नहीं चाहती मुक्ति।
चाहती हूॅं
जन्म मिले बार-बार,
न मरने से डरती हूॅं
न जीने से।
अच्छा लगता है
एक इंसान होना,
इच्छाओं के साथ जीना,
कामनाओं को पूरा करना।
जो इस बार न कर पाई
अगले जन्म में
या उससे भी
अगले जन्म में करुॅं,
बार-बार जीऊॅं,
बार- बार मरुॅं।
न जीने से डरती हूॅं
न मरने से।
Share Me
मधुर भावों की आहट
गुलाबी ठंड शीत की
आने लगी है।
हल्की-हल्की धूप में
मन लगता है,
धूप में नमी सुहाने लगी है।
कुहासे में छुपने लगी है दुनिया
दूर-दृष्टि गड़बड़ाने लगी है।
रेशमी हवाएं
मन को छूकर निकल जाती हैं
मधुर भावों की आहट
सपने दिखाने लगी है।
रातें लम्बी
दिन छोटे हो गये
नींद अब अच्छी आने लगी है।
चाय बनाकर पिला दे कोई,
इतनी-सी आस
सताने लगी है।
Share Me
किसने मेरी तक़दीर लिखी
न जाने कौन था वह
जिसने मेरी तक़दीर लिखी
ढूँढ रही हूँ उसे
जिसने मेरी तस्वीर बनाई।
मिले कभी तो पूछूँगी,
किसी जल्दी में थे क्या
आधा-अधूरा लिखा पन्ना
छोड़कर चल दिये।
आधे काॅलम मुझे खाली मिले।
अब बताओ भला
ऐसे कैसे जीऊँ भरपूर ज़िन्दगी।
मिलो तो कभी,
अपनी तक़दीर देना मेरे हाथ
फिर बताऊँगी तुम्हें
कैसे बीतती है ऐसे
आधी-अधूरी ज़िन्दगी।
Share Me
अपने मन से करके जी
एक अनुभव है मेरा।
कार्यालयों में
अपनी क्षमता से बढ़कर
काम करने वाले,
अपने-आपको
बड़ा तीसमारखां समझते हैं।
पहले-पहल तो
बड़ा आनन्द मिलता है,
सब चाटुकारिता में लगे रहते हैं
सराहना के पहाड़ खड़े करते हैं,
गुणों की खान बताते हैं
झाड़ पर चढ़ाते हैं
मदद की पुकार लगाते हैं।
अपनी समस्याएॅं बताकर
अपना काम उन पर थोपकर
नट जाते हैं।
मुॅंह पर खूब बड़ाई करते हैं,
पीठ पीछे न जाने कितनी
पदवियों से सुशोभित करते हैं
और जी भर कर उपहास करते हैं।
किन्तु
जब तक उन्हें
अपना शोषण समझ आने लगता है
तीर, कमान से निकल चुका होता है।
काम के साथ
त्रुटियों का पहाड़ भी उनके ही
सर पर खड़ा होता है।
.
हे नारी!
मेरी बात समझ आई
कि नहीं आई।
उतना कर
जितना कर सके।
कर, लेकिन
मर-मरकर न कर।
अपनी सीमाएॅं बाॅंध।
देवी, दुर्गा, सती, न्यारी-प्यारी
के मोह में न पड़
अबला-सबला,
प्रेम-प्यार की बातें न सुन।
महानता के पदकों से
जीवन नहीं चलता।
तेरे चक्रव्यूह में
सात नहीं सैंकड़ों योद्धा हैं
पहले ही सम्हल ले।
गुणों का घड़ा बड़ी जल्दी फूटता है
अवगुणों का भण्डार हर दम भरता है।
और एक बार भर जाये
फिर जीवन-भर नहीं उतरता है।
.
अपने लिए भी जी
लम्बी तान कर अपने मन से जी
जी भरकर जी,
पीठ पर बोझा लाद-लादकर न जी
मुट्ठियाॅं बाॅंधकर रख
मन से जी, अपने मन से जी
सबकी सुन
लेकिन अपने मन से करके जी।
Share Me
सरस-सरस लगती है ज़िन्दगी।
जल सी भीगी-भीगी है ज़िन्दगी।
कहीं सरल, कहीं धीमे-धीमे
आगे बढ़ती है ज़िन्दगी।
तरल-तरल भाव सी
बहकती है ज़िन्दगी।
राहों में धार-सी बहती है ज़िन्दगी।
चलें हिल-मिल
कितनी सुहावनी लगती है ज़िन्दगी।
किसी और से क्या लेना,
जब आप हैं हमारे साथ ज़िन्दगी।
आज भीग ले अन्तर्मन,
कदम-दर-कदम
मिलाकर चलना सिखाती है ज़िन्दगी।
राहें सूनी हैं तो क्या,
तुम साथ हो
तब सरस-सरस लगती है ज़िन्दगी।
आगे बढ़ते रहें
तो आप ही खुलने लगती हैं मंजिलें ज़िन्दगी।
Share Me
अनिच्छाओं को रोक मत
अनिच्छाओं को रोक मत प्रदर्शित कर
कोई रूठता है तो रूठने दे, तू मत डर
कब तक औरों की खुशियों को ढोते रहेंगे
जो मन न भाये उससे अपने को दूर रख
Share Me
सपनों की बात न करना यारो मुझसे
आंखों में तिरते हैं, पलकों में छिपते हैं
शब्दों में बंधते हैं, आहों में कटते हैं
सपनों की बात न करना यारो मुझसे
सांसों में बिंधते हैं, राहों में चुभते हैं।
Share Me
रसते–बसते घरों में खुशियां
रसते–बसते घरों में खुशियां चकले-बेलने की ताल पर बजती हैं।
मां रोटी पकाती है, घर महकता है, थाली-कटोरी सजती है।
देर शाम घर लौटकर सब साथ-साथ बैठते, हंसते-बतियाते,
निमन्त्रण है तुम्हें, देखना घर की दीवारें भी गुनगुनाने लगती हैं।
Share Me
अपनी कमज़ोरियों को बिखेरना मत
ज़रा सम्हलकर रहना,
अपनी पकड़ बनाकर रखना।
मन की सीमाओं पर
प्रहरी बिठाकर रखना।
मुट्ठियां बांधकर रखना।
भौंहें तानकर रखना।
अपनी कमज़ोरियों को
मंच पर
बिखेरकर मत रखना।
मित्र हो या शत्रु
नहीं पहचान पाते,
जब तक
ठोकर नहीं लगती।
फिर आंसू मत बहाना,
कि किसी ने धोखा दिया,
या किया विश्वासघात।