याद आते हैं वे दिन
याद आते हैं वे दिन जब सखियों संग स्कूल से आया करते थे
छीन-छीनकर एक-दूजे की रोटी आनन्द से खाया करते थे
राह चलते कभी खटमिट खाई, कभी खुरमानी तोड़ा करते थे
राहों में छुपन-छुपाई, गुल्ली-डंडा, लम्बी दौड़ लगाया करते थे
रस्सी-टप्पा, गिट्टे, उंच-नीच, स्टापू, जाने कितने खेल जमाया करते थे
पुरानी कापियाँ दे-देकर गोलगप्पे, चूरन, पापड़ी खाया करते थे
बारिश में भीग-भीगकर, छप्पक-छप्पक पानी उड़ाया करते थे
चलते-चलते जब थक जाते थे, बैग रख सो जाया करते थे
एक-दूसरे की कापियों की नकल कर होमवर्क कर लिया करते थे
याद आये वे दिन जब सखियों संग धमा-चैकड़ी मचाया करते थे
न जाने कौन कहाँ है आज याद नहीं, कुछ यादें रह गई हैं बस
कभी मिलेंगीं भी तो कहाँ पहचान होगी, क्यों सोच रही मैं आज
वे सड़कें, वे स्कूल, वो मस्तियाँ, लड़ना-झगड़ना, कुट्टी-मिट्टी
कभी-कभी बचपन के वे बीते दिन यूँ ही याद आ जाया करते थे