समझ लो क्या होते हैं कुकुरमुत्ते
बस कहने की बात है
बस मुहावरा भर है
कि उगते हैं कुकुरमुत्ते-से।
चले गये वे दिन
जब यहां वहां
जहां-तहां
दिखाई देते थे कुकुरमुत्ते।
लेकिन
अब नहीं दिखाई देते
कुकुरमुत्ते
जंगली नहीं रह गये
अब कुकुरमुत्ते
कीमत हो गई है इनकी
बिकते और खरीदे जाते हैं
वातानुकूलित भवनों में उगते हैं
भाव रखते हैं
ताव रखते हैं
किसी की ज़िन्दगी जीने का
हिसाब रखते हैं
घर-घर होते हैं कुकुरमुत्ते।
कहने को हैं
सब्जी-भर
समझ सको तो
समझ लो
अब क्या होते हैं कुकुरमुत्ते।
सपनों में जीने लगते हैं
लक्ष्य जितना सरल दिखता है
राहें
उतनी ही कठिन होने लगती हैं।
हमें आदत-सी हो जाती है
सब कुछ को
बस यूं ही ले लेने की
अभ्यास और प्रयास
की आदत छोड़ बैठते हैं
सपनों में जीने लगते हैं
लगता है
बस
हाथ बढ़ाएंगे
और चांद पकड़ लेंगे
अपने में खोये
ग्रहण और अमावस को
समझ नहीं पाते हम
सपनों में जीते
चांद को ही दोष देते हैं
सही राह नहीं पकड़ पाते हम।
-
लक्ष्य कठिन हो तो
राहें
आप ही सरल हो जाती हैं
क्योंकि तब हम समझ पाते हैं
चांद की दूरियां
और ग्रहण-अमावस का भाव
जीवन में।
कूड़े-कचरे में बचपन बिखरा है
आंखें बोलती हैं
कहां पढ़ पाते हैं हम
कुछ किस्से खोलती हैं
कहां समझ पाते हैं हम
किसी की मानवता जागी
किसी की ममता उठ बैठी
पल भर के लिए
मन हुआ द्रवित
भूख से बिलखते बच्चे
बेसहारा अनाथ
चल आज इनको रोटी डालें
दो कपड़े पुराने साथ।
फिर भूल गये हम
इनका कोई सपना होगा
या इनका कोई अपना होगा,
कहां रहे, क्या कह रहे
क्यों ऐसे हाल में है
हमारी एक पीढ़ी
कूड़े-कचरे में बचपन बिखरा है
किस पर डालें दोष
किस पर जड़ दें आरोप
इस चर्चा में दिन बीत गया !!
सांझ हुई
अपनी आंखों के सपने जागे
मित्रों की महफ़िल जमी
कुछ गीत बजे, कुछ जाम भरे
सौ-सौ पकवान सजे
जूठन से पंडाल भरा
अनायास मन भर आया
दया-भाव मन पर छाया
उन आंखों का सपना भागा आया
जूठन के ढेर बनाये
उन आंखों में सपने जगाये
भर-भर उनको खूब खिलाये
एक सुन्दर-सा चित्र बनाया
फे़सबुक पर खूब सजाया
चर्चा का माहौल बनाया
अगले चुनाव में खड़े हो रहे हम
आप सबको अभी से करते हैं नमन
भीड़ में अकेलापन
एक मुसाफ़िर के रूप में
कहां पूरी हो पाती हैं
जीवन भर यात्राएं
कहां कर पाते हैं
कोई सफ़र अन्तहीन।
लोग कहते हैं
अकेल आये थे
और अकेले ही जाना है
किन्तु
जीवन-यात्रा का
आरम्भ हो
या हो अन्तिम यात्रा, ं
देखती हूं
जाने-अनजाने लोगों की
भीड़,
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा
समझाते हुए,
जीवन-दर्शन बघारते हुए।
किन्तु इनमें से
कोई भी तो समय नहीं होता
यह सब समझने के लिए।
और जब समझने का
समय होता है
तब भीड़ में भी
अकेलापन मिलता है।
दर्शन
तब भी बघारती है भीड़
बस तुम्हारे नकारते हुए
समय आत्ममंथन का
पता नहीं यह कैसे हो गया ?
मुझे, अपने पैरों के नीचे की ज़मीन की
फ़िसलन का पता ही न लगा
और आकाश की उंचाई का अनुमान।
बस एक कल्पना भर थी
एक आकांक्षा, एक चाहत।
और मैंने छलांग लगा दी ।
आकाश कुछ ज़्यादा ही उंचा निकला
और ज़मीन कुछ ज़्यादा ही चिकनी।
मैं थी बेखबर, आकाश पकड़ न सकी
और पैर ज़मीन पर टिके नहीं।
दु:ख गिरने का नहीं
क्षोभ चोट लगने का नहीं।
पीड़ा हारने की नहीं।
ये सब तो सहज परिणाम हैं,
अनुभव की खान हैं
किसी की हिम्मत के।
समय आत्ममंथन का।
कितना कठिन होता है
अपने आप से पूछना।
और कितना सहज होता है
किसी को गिरते देखना
उस पर खिलखिलाना
और ताली बजाना।
कितना आसान होता है
चारों ओर भीड़ का मजमा लगाना।
ढोल बजा बजा कर दुनिया को बताना।
जख़्मों को कुरेद कुरेद कर दिखाना।
और कितना मुश्किल होता है
किसी के जख़्मों की तह तक जाना
उसकी राह में पड़े पत्थरों को हटाना
और सही मौके पर सही राह बताना।
एकान्त की ध्वनि
एकान्त काटता है,
एकान्त कचोटता है
किन्तु अपने भीतर के
एकान्त की ध्वनि
बहुत मुखर होती है।
बहुत कुछ बोलती है।
जब सन्नाटा टूटता है
तब कई भेद खोलती है।
भीतर ही भीतर
अपने आप को तलाशती है।
किन्तु हम
अपने आपसे ही डरे हुए
दीवार पार की आवाज़ें तो सुनते हैं
किन्तु अपने भीतर की आवाज़ों को
नकारते हैं
इसीलिए जीवन भर
हारते है।
जीवन-दर्शन
चांद-सूरज की रोशनी जीवन की राह दिखाती है।
रात-दिन में बंटे, जीवन का आवागमन समझाती है।
दोनों ही सामना करते हैं अंधेरों और रोशनी का,
यूं ही हमें जीवन-दर्शन समझा-समझा जाती है।
रेखाएं बोलती हैं
घर की सारी
खिड़कियां-दरवाज़े
बन्द रखने पर भी
न जाने कहां से
धूल आ पसरती है
भीतर तक।
जाने-अनजाने
हाथ लग जाते हैं।
शीशों पर अंगुलियां घुमाती हूं,
रेखाएं खींचती हूं।
गर्द बोलने लगती है,
आकृतियों में, शब्दों में।
गर्द उड़ने लगती है
आकृतियां और शब्द
बदलने लगते हैं।
एक साफ़ कपड़े से
अच्छे से साफ़ करती हूं,
किन्तु जहां-तहां
कुछ लकीरें छूट जाती हैं
और फिर आकृतियां बनने लगती हैं,
शब्द घेरने लगते हैं मुझे।
अरे!
डरना क्या!
इसी बात पर मुस्कुरा देने में क्या लगता है।
मौत कब आयेगी
कहते हैं
मौत कब आयेगी
कोई नहीं जानता
किन्तु
रावण जानता था
कि उसकी मौत कब आयेगी
और कौन होगा उसका हंता।
प्रश्न यह नहीं
कि उद्देश्य क्या रहा होगा,
चिन्तन यह कि
जब संधान होगा
तब कुछ तो घटेगा ही।
और यूंही तो
नहीं साधा होगा निशाना
कुछ तो मन में रहा होगा ही।
जब तीर छूटेगा
तो निशाने पर लगे
या न लगे
कहीं तो लगेगा ही
फिर वह
मछली की आंख हो अथवा
पिता-पुत्र की देह।
तेरी माया तू ही जाने
कभी तो चांद पलट न।
कभी तो सूरज अटक न।
रात-दिन का आभास देते,
तम-प्रकाश का भाव देते,
कभी तो दूर सटक न।
चांद को अक्सर
दिन में देखती हूं,
कभी तो सूरज
रात में निकल न।
तुम्हारा तो आवागमन है
प्रकृति का चलन है
हमने न जाने कितने
भाव बांध लिये हैं
रात-दिन का मतलब
सुख-दुख, अच्छा-बुरा
और न जाने क्या-क्या।
कभी तो इन सबसे
हो अलग न।
तेरी माया तू ही जाने
कभी तो रात-दिन से
भटक न।
जब एक तिनका फंसता है
दांत में
जब एक तिनका फंस जाता है
हम लगे रहते हैं
जिह्वा से, सूई से,
एक और तिनके से
उसे निकालने में।
किन्तु , इधर
कुछ ऐसा फंसने लगा है गले में
जिसे, आज हम
देख तो नहीं पा रहे हैं,
जो धीरे-धीरे, अदृश्य,
एक अभेद्य दीवार बनकर
घेर रहा है हमें चारों आेर से।
और हम नादान
उसे दांत का–सा तिनका समझकर
कुछ बड़े तिनकों को जोड़-जोड़कर
आनन्दित हो रहे हैं।
किन्तु बस
इतना ही समझना बाकी रह गया है
कि जो कृत्य हम कर रहे हैं
न तो तिनके से काम चलने वाला है
न सूई से और न ही जिह्वा से।
सीधे झाड़ू ही फ़िरेगा
हमारे जीवन के रंगों पर।
वक्त की रफ्तार देख कर
वक्त की रफ्तार देख कर
मैंने कहा, ठहर ज़रा,
साथ चलना है मुझे तुम्हारे।
वक्त, ऐसा ठहरा
कि चलना ही भूल गया।
आज इस मोड़ पर समझ आया,
वक्त किसी के साथ नहीं चलता।
वक्त ने बहुत आवाज़ें दी थीं,
बहुत बार चेताया था मुझे,
द्वार खटखटाया था मेरा,
किन्तु न जाने
किस गुरूर में था मेरा मन,
हवा का झोंका समझ कर
उपेक्षा करती रही।
वक्त के साथ नहीं चल पाते हम।
बस हर वक्त
किसी न किसी वक्त को कोसते हैं।
एक भी
ईमानदार कोशिश नहीं करते,
अपने वक्त को,
अपने सही वक्त को पहचानने की ।
झूठ के बल पर
सत्य सदैव प्रमाण मांगता है,
और हम इस डर से,
कि पता नहीं
सत्य प्रमाणित हो पायेगा
या नहीं,
झूठ के बल पर
बेझिझक जीते हैं।
तब हमें
न सत्य की आंच सहनी पड़ती है,
न किसी के सामने
हाथ फैलाने पड़ते हैं।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
नहीं ढोने पड़ते हैं
आरोप–प्रत्यारोप,
न कोई आहुति , न बलिदान,
न अग्नि-परीक्षाएं
न पाषाण होने का भय।
नि:शंक जीते हैं हम ।
और न अकेलेपन की समस्या ।
एक ढूंढो
हज़ारों मिलेंगे साथ चलने के लिए।
अपनी ही प्रतिच्छाया को नकारते हैं हम
अपनी छाया को अक्सर नकार जाते हैं हम।
कभी ध्यान से देखें
तो बहुत कुछ कह जाती है।
डरते हैं हम अपने अकेलेपन से।
किन्तु साथ-साथ चलते-चलते
न जाने क्या-क्या बता जाती है।
अपनी अन्तरात्मा को तो
बहुत पुकारते हैं हम,
किन्तु अपनी ही प्रतिच्छाया को
नकारते हैं हम।
नि:शब्द साथ-साथ चलते,
बहुत कुछ समझा जाती है।
हम अक्सर समझ नहीं पाते,
किन्तु अपने आकार में छाया
बहुत कुछ बोल जाती है।
कदम-दर-कदम,
कभी आगे कभी पीछे,
जीवन के सब मोड़ समझाती है।
छोटी-बड़ी होती हुई ,
दिन-रात, प्रकाश-तम के साथ,
अपने आपको ढालती जाती है।
जीवन परिवर्तन का नाम है।
कभी सुख तो कभी दुख,
जीवन में आवागमन है।
समस्या बस इतनी सी
कि हम अपना ही हाथ
नहीं पकड़ते
ज़माने भर का सहारा ढूंढने निकल पड़ते हैं।
नया सूर्य उदित होगा ही
आजकल रोशनियां
डराने लगी हैं,
अंधेरे गहराने लगे हैं।
विपदाओं की कड़ी
लम्बी हो रही है।
इंसान से इंसान
डरने लगा है।
ख़ौफ़ भीतर तक
पसरने लगा है।
राहें पथरीली होने लगी हैं,
पहचान मिटने लगी है।
ज़िन्दगी
बेनाम दिखने लगी है।
पर कब चला है इस तरह जीवन।
कब तक चलेगा इस तरह जीवन।
जानते हैं हम,
बादल घिरते हैं
तो बरस कर छंटते भी हैं।
बिजली चमकती है
तो रोशनी भी देती है।
अंधेरों को
परखने का समय आ गया है।
ख़ौफ़ के साये को
तोड़ने का समय आ गया है।
जीवन बस डर से नहीं चलता,
आशाओं को फिर से
सहेजने का समय आ गया है।
नया सूर्य उदित होने को है,
हाथ बढ़ाओ ज़रा,
हाथ से हाथ मिलाओ ज़रा,
सबको अपना बनाने का
समय आ गया है।
नया सूर्य उदित होगा ही,
अपने लिए तो सब जीते हैं,
औरों के दुख को
अपना बनाने का समय आ गया है।
बस जूझना पड़ता है
मछलियां गहरे पानी में मिलती हैं
किसी मछुआरे से पूछना।
माणिक-मोती पाने के लिए भी
गहरे सागर में
उतरना पड़ता है,
किसी ज्ञानी से बूझना।
किश्तियां भी
मझधार में ही डूबती हैं
किसी नाविक से पूछना।
तल-अतल की गहराईयों में
छिपा है ज्ञान का अपरिमित भंडार,
किसी वेद-ध्यानी से पूछना।
पाताल लोक से
चंद्र-मणि पाने के लिए
कौन-सी राह जाती है,
किसी अध्यवसायी से पूछना।
.
उपलब्धियों को पाने के लिए
गहरे पानी में
उतरना ही पड़ता है।
जूझना पड़ता है,
सागर की लहरों से,
सहना पड़ता है
मझधार के वेग को,
और आकाश से पाताल
तक का सफ़र तय करना पड़ता है।
और इन कोशिशों के बीच
जीवन में विष मिलेगा
या अमृत,
यह कोई नहीं जानता।
बस जूझना पड़ता है।
आशाओं का जाल
जो है वह नहीं,
जो नहीं है,
उसकी ही प्रतीक्षा में
विचलित रहता है मन।
शिशिर में ग्रीष्म ,
और ग्रीष्म में चाहिए झड़ी।
जी जलता है आशाओं के जाल में।
देता है जीवन दिल खोलकर,
बस हम पकड़ते ही नहीं।
पकड़ते नहीं जीवन के
लुभावने पलों को ।
एक मायावी संसार में जीते हैं,
और-और की आस में।
और इस और-और की आस में,
जो मिला है
उसे भी खो बैठते हैं।
आत्माओं का मिलन चाहते हैं,
और सम्बन्धों को संवारते नहीं।
मन के इस बियाबान में
मन के बियाबान में
जब राहें बनती हैं
तब कहीं समझ पाते हैं।
मौसम बदलता है।
कभी सूखा,
तो कभी
हरीतिमा बरसती है।
जि़न्दगी बस
राहें सुझाती है।
उपवन महकता है,
पत्ती-पत्ती गुनगुन करती है।
फिर पतझड़, फिर सूखा।
फिर धरा के भीतर से ,
पनपती है प्यार की पौध।
उसी के इंतजार में खड़े हैं।
मन के इस बियाबान में
एकान्त मन।
मेरे हिस्से का सूरज
कैसे कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज खा भी गये।
यूं देखा जाये
तो रोशनी पर सबका हक़ है।
पर सबके पास
अपने-अपने हक का
सूरज भी तो होता है।
फ़िर, क्यों, कैसे
कुछ लोग
मेरे हिस्से का सूरज खा गये।
बस एक बार
इतना ही समझना चाहती हूं
कि गलती मेरी थी कहीं,
या फिर
लोगों ने मेरे हक का सूरज
मुझसे छीन लिया।
शायद गलती मेरी ही थी।
बिना सोचे-समझे
रोशनियां बांटने निकल पड़ी मैं।
यह जानते हुए भी
कि सबके पास
अपना-अपना सूरज भी है।
बस बात इतनी-सी
कि अपने सूरज की रोशनी पाने के लिए
कुछ मेहनत करनी पड़ती है,
उठाने पड़ते हैं कष्ट,
झेलनी पड़ती हैं समस्याएं।
पर जब यूं ही
कुछ रोशनियां मिल जायें,
तो क्यों अपने सूरज को जलाया जाये।
जब मैं नहीं समझ पाई,
इतनी-सी बात।
तो होना यही था मेरे साथ,
कि कुछ लोग
मेरे हिस्से का सूरज खा गये।
हम श्मशान बनने लगते हैं
इंसान जब मर जाता है,
शव कहलाता है।
जिंदा बहुत शोर करता था,
मरकर चुप हो जाता है।
किन्तु जब मर कर बोलता है,
तब प्रेत कहलाता है।
.
श्मशान में टूटती चुप्पी
बहुत भयंकर होती है।
प्रेतात्माएं होती हैं या नहीं,
मुझे नहीं पता,
किन्तु जब
जीवित और मृत
के सम्बन्ध टूटते हैं,
तब सन्नाटा भी टूटता है।
कुछ चीखें
दूर तक सुनाई देती हैं
और कुछ
भीतर ही भीतर घुटती हैं।
आग बाहर भी जलती है
और भीतर भी।
इंसान है, शव है या प्रेतात्मा,
नहीं समझ आता,
जब रात-आधी-रात
चीत्कार सुनाई देती है,
सूर्यास्त के बाद
लाशें धधकती हैं,
श्मशान से उठती लपटें,
शहरों को रौंद रही हैं,
सड़कों पर घूम रही हैं,
बेखौफ़।
हम सिलेंडर, दवाईयां,
बैड और अस्पताल का पता लिए,
उनके पीछे-पीछे घूम रहे हैं
और लौटकर पंहुच जाते हैं
फिर श्मशान घाट।
.
फिर चुपचाप
गणना करने लगते हैं, भावहीन,
आंकड़ों में उलझे,
श्मशान बनने लगते हैं।
अपनी आवाज़ अपने को सुनाती हूं मैं
मन के द्वार
खटखटाती हूं मैं।
अपनी आवाज़
अपने को सुनाती हूं मैं।
द्वार पर बैठी
अपने-आपसे
बतियाती हूं मैं।
इस एकान्त में
अपने अकेलपन को
सहलाती हूं मैं।
द्वार उन्मुक्त हों या बन्द,
कहानी कहां बदलती है जीवन की,
सहेजती हूं कुछ स्मृतियां रंगों में,
कुछ को रंग देती हूं,
आकार देती हूं,
सौन्दर्य और आभास देती हूं।
जीवन का, नवजीवन का
भास देती हूं।
नदिया से मैंने पूछा
नदिया से मैंने पूछा
कल-कल कर क्यों बहती हो।
बहते-बहते
कभी सिमट-सिमट कर
कभी बिखर-बिखर जाती हो।
कभी मधुर संगीत छेड़ती
कभी विकराल रूप दिखाती हो।
कभी सूखी,
कभी लहर-लहर लहराती हो।
नदिया बोली,
मुझसे क्या पूछ रहे
तुम भी तो ऐसे ही हो मानव।
पर मैं आज तुम्हें चेताती हूं।
इसीलिए,
कल-कल की बातें कहती हूं।
समझ सको तो, सम्हल सको तो
रूक कर, ठहर-ठहर कर
सोचो तुम।
बहते-बहते, सिमट-सिमट कर
अक्सर क्यों बिखर-बिखर जाती हूं ।
मधुर संगीत छेड़ती
क्यों विकराल रूप दिखाती हूं।
जब सूखी,
फिर कहां लहर-लहर लहराती हूं।
मैं आज तुम्हें चेताती हूं।
बीहड़ वन आकर्षित करते हैं मुझे
कभी भीतर तक जाकर
देखे तो नहीं मैंने बीहड़ वन,
किन्तु ,
आकर्षित करते हैं मुझे।
कितना कुछ समेटकर रहते हैं
अपने भीतर।
गगन को झुकते देखा है मैंने यहां।
पल भर में धरा पर
उतर आता है।
रवि मुस्कुराता है,
छन-छनकर आती है धूप।
निखरती है, कण-कण को छूती है।
इधर-उधर भटकती है,
न जाने किसकी खोज में।
वृक्ष निःशंक सर उठाये,
रवि को राह दिखाते हैं,
धरा तक लेकर आते हैं।
धाराओं को
यहां कोई रोकता नहीं,
बेरोक-टोक बहती हैं।
एक नन्हें जीव से लेकर
विशाल व्याघ्र तक रहते हैं यहां।
मौसम बदलने से
यहां कुछ नहीं बदलता।
जैसा कल था
वैसा ही आज है,
जब तक वहां मानव का
प्रवेश नहीं होता।
ज़िन्दगी जीने के लिए क्या ज़रूरी है
कितना अच्छा लगता है,
और कितना सम्मानजनक,
जब कोई कहता है,
चलो आज शाम
मिलते हैं कहीं बाहर।
-
बाहर !
बाहर कोई पब,
शराबखाना, ठेका
या कोई मंहगा होटल,
ये आपकी और उनकी
जेब पर निर्भर करता है,
और निर्भर करता है,
सरकार से मिली सुविधाओं पर।
.
एक सौ गज़ पर
न अस्पताल मिलेंगे,
न विद्यालय, न शौचालय,
न विश्रामालय।
किन्तु मेरे शहर में
खुले मिलेंगे ठेके, आहाते, पब, होटल,
और हुक्का बार।
सरकार समझती है,
आम आदमी की पहली ज़रूरत,
शराब है न कि राशन।
इसीलिए,
राशन से पहले खुले थे ठेके।
और शायद ठेके की लाईन में
लगने से
कोरोना नहीं होता था,
कोरोना होता था,
ठेला चलाने से,
सब्ज़ी-भाजी बेचने से,
छोटे-छोटे श्रम-साधन करके
पेट भरने वालों से।
इसीलिए सुरक्षा के तौर पर
पहले ठेके पर जाईये,
बाद में घर की सोचिए।
-
ज़िन्दगी जीने के लिए क्या ज़रूरी है
कौन लेगा यह निर्णय।
मन में बोनसाई रोप दिये हैं
विश्वास का आकाश
आज भी उतना ही विस्तारित है
जितना पहले हुआ करता था।
बस इतनी सी बात है
कि हमने, अपने मन में बसे
पीपल, वट-वृक्ष को
कांट-छांट कर
बोनसाई रोप दिये हैं,
और हर समय खुरपा लेकर
जड़ों को खोदते रहते हैं,
कहने को निखारते हैं,
सजाते-संवारते हैं,
किन्तु, वास्तव में
अपनी ही कृति पर अविश्वास करते हैं।
तो फिर किसी और से कैसी आशा।
हैं तो सब इंसान ही
एक असमंजस की स्थिति में हूं।
शब्दों के अर्थ
अक्सर मुझे भ्रमित करते हैं।
कहते हैं
पर्यायवाची शब्द
समानार्थक होते हैं,
तब इनकी आवश्यकता ही क्या ?
इंसान और मानव से मुझे,
इंसानियत और मानवीयता का बोध होता है।
आदमी से एक भीड़ का,
और व्यक्ति से व्यक्तित्व,
एकल भाव का।
.
शायद
इन सबके संयोग से
यह जग चलता है,
और तब ईश्वर यहीं
इनमें बसता है।
प्रकाश तम में कहीं सिमटा है
मन में आज एक द्वंद्व है,
सब उल्टा-सुल्टा।
चांद-सितारे मानों भीतर,
सूरज कहीं गायब है।
धरा-गगन एकमेक हुए,
न अन्तर कोई दिखता है।
आंख मूंद जगत को निरखें,
कौन, कहां, कहीं दिखता है।
सब सूना-सूना-सा लगता है,
मन न जाने कहां भटकता है।
सुख-दुख से परे हुआ है मन,
प्रकाश तम में कहीं सिमटा है।
असमंजस में रहते हैं हम
कितनी बार,
हम समझ ही नहीं पाते,
कि परम्पराओं में जी रहे हैं,
या रूढ़ियों में।
.
दादी की परम्पराएं,
मां के लिए रूढ़ियां थीं,
और मां की परम्पराएं
मुझे रूढ़ियां लगती हैं।
.
हमारी पिछली पीढ़ियां
विरासत में हमें दे जाती हैं,
न जाने कितने अमूल्य विचार,
परम्पराएं, संस्कृति और व्यवहार,
कुछ पुराने यादगार पल।
इस धरोहर को
कभी हम सम्हाल पाते हैं,
और कभी नहीं।
कभी सार्थक लगती हैं,
तो कभी अर्थहीन।
गठरियां बांधकर
रख देते हैं
किसी बन्द कमरे में,
कभी ज़रूरत पड़ी तो देखेंगे,
और भूल जाते हैं।
.
ऐसे ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी
सौंपी जाती है विरासत,
किसी की समझ आती है
किसी की नहीं।
किन्तु यह परम्परा
कभी टूटती नहीं,
चाहे गठरियों
या बन्द कमरों में ही रहें,
इतना ही बहुत है।
काश ! इंसान वट वृक्ष सा होता
कहते हैं
जड़ें ज़मीन में जितनी गहरी हों
वृक्ष उतने ही फलते-फूलते हैं।
अपनी मिट्टी की पकड़
उन्हें उर्वरा बनाये रखती है।
किन्तु वट-वृक्ष !
मैं नहीं जानती
कि ज़मीन के नीचे
इसकी कहां तक पैठ है।
किन्तु इतना समझती हूं
कि अपनी जड़ों को
यह धरा पर भी ले आया है।
डाल से डाल निकलती है
उलझती हैं,सुलझती हैं
बिखरती हैं, संवरती हैं,
वृक्ष से वृक्ष बनते हैं।
धरा से गगन,
और गगन से धरा की आेर
बार-बार लौटती हैं इसकी जड़ें
नव-सृजन के लिए।
-
बस
इंसान की हद का ही पता नहीं लगता
कि कितना ज़मीन के उपर है
और कितना ज़मीन के भीतर।
सागर की गहराईयों सा मन
सागर की गहराईयों सा मन।
सागर के सीने में
अनगिन मणि-रत्नम्
कौन ढूंढ पाया है आज तलक।
.
मन में रहते भाव-संगम
उलझे-उलझे, बिखरे-बिखरे,
कौन समझ पाया है
आज तलक।
.
लहरें आती हैं जाती हैं,
हिचकोले लेती नाव।
जग-जगत् में
मन भागम-भाग किया करता है,
कहां मिलता आराम।
.
खुले नयनों पर वश है अपना,
देखें या न देखें।
पर बन्द नयन
न जाने क्या-क्या दिखला जाते हैं,
अनजाने-अनचाहे भाव सुना जाते हैं,
जिनसे बचना चाहें,
वे सब रूप दिखा जाते हैं।
अगला-पिछला, अच्छा-बुरा
सब हाल बता जाते हैं,
अनचाहे मोड़ों पर खड़ा कर
कभी हंसी देकर,
तो कभी रूलाकर चले जाते हैं।