प्रेम-प्यार की बात न करना

प्रेम-प्यार की बात न करना,

घृणा के बीज हम बो रहे हैं।

.

सम्बन्धों का मान नहीं अब,

दीवारें हम अब चिन रहे हैं।

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काले-गोरे की बात चल रही,

चेहरों को रंगों से पोत रहे हैं

.

अमीर-गरीब की बात कर रहे,

पैसे से दुनिया को तोल रहे हैं

.

कौन है सच्चा, कौन है झूठा,

बिन जाने हम कोस रहे हैं।

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पढ़ना-लिखना बात पुरानी

सुनी-सुनाई पर चल रहे हैं।

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सर्वधर्म समभाव भूल गये,

भेद-भाव हम ढो रहे हैं।

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अपने-अपने रूप चुन लिए,

किस्से रोज़ नये बुन रहे हैं।

-

राजनीति का ज्ञान नहीं है

चर्चा में हम लगे हुए हैं।  

 

आने वाला कल

अपने आज से परेशान हैं हम।

क्या उपलब्धियां हैं

हमारे पास अपने आज की,

जिन पर

गर्वोन्नत हो सकें हम।

और कहें

बदलेगा आने वाला कल।

.

कैसे बदलेगा

आने वाला कल,

.

डरे-डरे-से जीते हैं।

सच बोलने से कतराते हैं।

अन्याय का

विरोध करने से डरते हैं।

भ्रमजाल में जीते हैं -

आने वाला कल अच्छा होगा !

सही-गलत की

पहचान खो बैठे हैं हम,

बनी-बनाई लीक पर

चलने लगे हैं हम।

राहों को परखते नहीं।

बरसात में घर से निकलते नहीं।

बादलों को दोष देते हैं।

सूरज पर आरोप लगाते हैं,

चांद को घटते-बढ़ते देख

नाराज़ होते हैं।

और इस तरह

वास्तविकता से भागने का रास्ता

ढूंढ लेते हैं।

-

तो

कैसे बदलेगा आने वाला कल ?

क्योंकि

आज ही की तो

प्रतिच्छाया होता है

आने वाला कल।

 

बूंद-बूंद से घट भरता था

जिन ढूंढा तिन पाईया

गहरे पानी पैठ,

बात पुरानी हो गई।

आंख में अब

पानी कहां रहा।

मन की सीप फूट गई।

दिल-सागर-नदिया

उथले-उथले हो गये।

तलछट में क्या ढूंढ रहे।

बूंद-बूंद से घट भरता था।

जब सीपी पर गिरती थी,

तब माणिक-मोती ढलता था।

अब ये कैसा मन है

या तो सब वीराना

सूखा-सूखा-सा रहता है,

और जब मन में

कुछ फंसता है,

तो अतिवृष्टि

सब साथ बहा ले जाती है,

कुछ भी तो नहीं बचता है।

 

 

दीप तले अंधेरे की बात करते हैं

सूरज तो सबका है,

सबके अंधेरे दूर करता है।

किन्तु उसकी रोशनी से

अपना मन कहां भरमाता है ।

-

अपनी रोशनी के लिए,

अपने गुरूर से

अपना दीप प्रज्वलित करते है।

और अंधेरा मिटाने की बात करते हैं।

-

फिर  भी अक्सर

न जाने क्यों

दीप तले अंधेरे की बात करते हैं।

-

तो हिम्मत करें,

हाथ पर रखें लौ को

तब जग से

तम मिटाने की बात करते हैं।

 

 

नदी के उस पार कच्चा रास्ता है

कच्ची राहों पर चलना

भूल रहे हैं हम,

धूप की गर्मी से

नहीं जूझ रहे हैं हम।

पैरों तले बिछते हैं 

मखमली कालीन,

छू न जाये कहीं

धरा का कोई अंश।

उड़ती मिट्टी पर

लगा दी हैं

कई बंदिशें,

सिर पर तान ली हैं,

बड़ी-बड़ी छतरियां

हवा, पानी, रोशनी से

बच कर निकलने लगे हैं हम।

पानी पर बांध लिए हैं

बड़े-बड़े बांध,

गुज़र जायेंगी गाड़ियां,

ज़रूरत पड़े तो

उड़ा लेंगे विमान,

 

पर याद नहीं रखते हम

कि ज़िन्दगी

जब उलट-पलट करती है,

एक साथ बिखरता है सब

टूटता है, चुभता है,

हवा,पानी, मिट्टी

सब एकमेक हो जाते हैं

तब समझ में आता है

यह ज़िन्दगी है एक बहाव

और नदी के उस पार

कच्चा रास्ता है।

तुम्हारा अंहकार हावी रहा मेरे वादों पर

जीवन में सारे काम

सदा

जल्दबाज़ी से नहीं होते।

कभी-कभी

प्रतीक्षा के दो पल

बड़े लाभकारी होते हैं।

बिगड़ी को बना देते हैं

ठहरी हुई

ज़िन्दगियों को संवार देते हैं।

समझाया था तुम्हें

पर तुम्हारा

अंहकार हावी रहा

मेरे वादों पर।

मैंने कब इंकार किया था

कि नहीं दूंगी साथ तुम्हारा

जीवन की राहों में।

हाथ थामना ही ज़रूरी नहीं होता

एक विश्वास की झलक भी

अक्सर राहें उन्मुक्त कर जाती है।

किन्तु

तुम्हारा अंहकार हावी रहा,

मेरे वादों पर।

अब न सुनाओ मुझे

कि मैं अकेले ही चलता रहा।

ये चयन तुम्हारा था।

मन में सुबोल वरण कर

तर्पण कर,

मन अर्पण कर,

कर समर्पण।

भाव रख, मान रख,

प्रण कर, नमन कर,

सबके हित में नाम कर।

अंजुरि में जल की धार

लेकर सत्य की राह चुन।

मन-मुटाव छांटकर

वैर-भाव तिरोहित कर।

अपनों को स्मरण कर,

उनके गुणों का मनन कर।

राहों की तलाश कर

जल-से तरल भाव कर।

कष्टों का हरण कर,

मन में सुबोल वरण कर।

ज़िन्दगी कहीं सस्ती तो नहीं

बहुत कही जाती है एक बात

कि जब

रिश्तों में गांठें पड़ती हैं,

नहीं आसान होता

उन्हें खोलना, सुलझाना।

कुछ न कुछ निशान तो

छोड़ ही जाती हैं।

 

लेकिन सच कहूं

मुझे अक्सर लगता है,

जीवन में

कुछ बातों में

गांठ बांधना भी

ज़रूरी होता है।

 

टूटी डोर को भी

हम यूं ही नहीं जाने देते

गांठे मार-मारकर

सम्हालते हैं,

जब तक सम्हल सके।

 

ज़िन्दगी कहीं

उससे सस्ती तो नहीं,

फिर क्यों नहीं कोशिश करते,

यहां भी कभी-कभार,

या बार-बार।

 

दिखाने को अक्सर मन हंसता है

चोट कहां लगी थी,

कब लगी थी,

कौन बतलाए किसको।

दिल छोटा-सा है

पर दर्द बड़ा है,

कौन बतलाए किसको।

गिरता है बार-बार,

और बार-बार सम्हलता है।

बहते रक्त को देखकर

दिखाने को अक्सर मन  हंसता है।

मन की बात कह ले पगले,

कौन समझाए उसको।

न डर कि कोई हंसेगा,

या साथ न देगा कोई।

ऐसे ही दुनिया चलती है,

जीवन ऐसे ही चलता है,

कौन समझाए उसको।

आंसू भीतर-भीतर तिरते हैं,

आंखों में मोती बनते हैं,

तिनका अटका है आंख में,

कहकर,

दिखाने को अक्सर मन हंसता है।

खिलता है कुकुरमुत्ता

सुना है मैंने

बादलों की गड़गड़ाहट से

बिजली कड़कने पर

पहाड़ों में

खिलता है कुकुरमुत्ता।

प्रकृति को निरखना

अच्छा लगता है,

सौन्दर्य बांटती है

रंग सजाती है,

मन मुदित करती है,

पर पता नहीं क्यों

तुम्हें

अक्सर पसन्द नहीं करते लोग।

 

अपने-आप से प्रकट होना,

बढ़ना और बढ़ते जाना,

जीवन्तता,

कितनी कठिन होती है,

यह समझते नहीं

तुम्हें देखकर लोग।

 

अपने स्वार्थ-हित

नाम बदल-बदलकर

पुकारते हैं तुम्हें।

 

इस भय से

कि पता नहीं तुमसे

अमृत मिलेगा या विष।

 

कभी अपने भीतर भी

झांककर देख रे इंसान,

कि पता नहीं तुमसे

अमृत मिलेगा या विष।

 

दोराहों- चौराहों  को सुलझाने बैठी हूं

छोटे-छोटे कदमों से

जब चलना शुरू किया,

राहें उन्मुक्त हुईं।

ज़िन्दगी कभी ठहरी-सी

कभी भागती महसूस हुई।

अनगिन सपने थे,

कुछ अपने थे,

कुछ बस सपने थे।

हर सपना सच्चा लगता था।

हर सपना अच्छा लगता था।

मन की भटकन थी

राहों में अटकन थी।

हर दोराहे पर, हर चौराहे पर,

घूम-घूमकर जाते।

लौट-लौटकर आते।

जीवन में कहीं खो जाते।

समझ में ही थी तकरार

दुविधा रही अपार।

सब पाने की चाहत थी,

पर भटके कदमों की आहट थी।

क्या पाया, क्या खोया,

कभी कुछ समझ न आया।

अब भी दोराहों- चौराहों  को

सुलझाने बैठी हूं,

न जाने क्यों ,

अब तक इस में उलझी बैठी हूं।

हम तो आनन्दित हैं, तुमको क्या

इस जग में एक सुन्दर जीवन मिला है, मर्त्यन लोक है इससे क्या

सुख-दुख तो आने जाने हैं,पतझड़-सावन, प्रकाश-तम है हमको क्या

जब तक जीवन है, भूलकर मृत्यु के डर को जीत लें तो क्या बात है

कोई कुछ भी उपदेश देता रहे, हम तो आनन्दित हैं, तुमको क्या

दीप तले अंधेरा ढूंढते हैं हम

रोशनी की चकाचौंध में अक्सर अंधकार के भाव को भूल बैठते हैं हम

सूरज की दमक में अक्सर रात्रि के आगमन से मुंह मोड़ बैठते हैं हम

तम की आहट भर से बौखलाकर रोशनी के लिए हाथ जला बैठते हैं

ज्योति प्रज्वलित है, फिर भी दीप तले अंधेरा ही ढूंढने बैठते हैं हम

कड़वाहटों को बो रहे हैं हम

गत-आगत के मोह में आज को खो रहे हैं हम

जो मिला या न मिला इस आस को ढो रहे हैं हम

यहां-वहां, कहां-कहां, किस-किसके पास क्या है

इसी कशमकश में कड़वाहटों को बो रहे हैं हम

अपने-आपको अपने साथ ही बांटिये अपने-आप से मिलिए

हम अक्सर सन्नाटे और

शांति को एक समझ बैठते हैं।

 

शांति भीतर होती है,

और सन्नाटा !!

 

बाहर का सन्नाटा

जब भीतर पसरता है

बाहर से भीतर तक घेरता है,

तब तोड़ता है।

अन्तर्मन झिंझोड़ता है।

 

सन्नाटे में अक्सर

कुछ अशांत ध्वनियां होती हैं।

 

हवाएं चीरती हैं

पत्ते खड़खड़ाते हैं,

चिलचिलाती धूप में

बेवजह सनसनाती आवाज़ें,

लम्बी सूनी सड़कें

डराती हैं,

आंधियां अक्सर भीतर तक

झकझोरती हैं,

बड़ी दूर से आती हैं

कुत्ते की रोने की आवाज़ें,

बिल्लियां रिरियाती है।

पक्षियों की सहज बोली

चीख-सी लगने लगती है,

चेहरे बदनुमा दिखने लगते हैं।

 

हम वजह-बेवजह

अन्दर ही अन्दर घुटते हैं,

सोच-समझ

कुंद होने लगती है,

तब शांति की तलाश में निकलते हैं

किन्तु भीतर का सन्नाटा छोड़ता नहीं।

 

कोई न मिले

तो अपने-आपको

अपने साथ ही बांटिये,

अपने-आप से मिलिए,

लड़िए, झगड़िए, रूठिए,मनाईये।

कुछ खट्टा-मीठा, मिर्चीनुमा बनाईये

खाईए, और सन्नाटे को तोड़ डालिए।

कल डाली पर था आज गुलदान में

कवियों की सोच को न जाने क्या हुआ है, बस फूलों पर मन फिदा हुआ है

किसी के बालों में, किसी के गालों में, दिखता उन्हें एक फूल सजा हुआ है

प्रेम, सौन्दर्य, रस का प्रतीक मानकर हरदम फूलों की चर्चा में लगे हुये हैं

कल डाली पर था, आज गुलदान में, और अब देखो धरा पर पड़ा हुआ है

वक्त कब कहां मिटा देगा

वक्त कब क्यों बदलेगा कौन जाने

वक्त कब बदला लेगा कौन जाने

संभल संभल कर कदम रखना ज़रा

वक्त कब कहां मिटा देगा कौन जाने

औरों को मत देख बस अपने मन में ठान ले

अपने जीवन को  निष्‍कपट बनाने के लिए क्रांति की जरूरत है

अपने भीतर की बुराईयों को मिटाने के लिए क्रांति की जरूरत है

किसी क्रांतिकारी ने कभी झाड़ू नहीं उठाया था किसी नारे के साथ

औरों को मत देख बस अपने मन में ठान ले इसकी ज़रूरत है

स्वच्छता अभियान की नहीं, स्वच्छ भारत बनाये रखने की ज़रूरत है

न उदास हो मन

पथ पर कंटक होते है तो फूलों की चादर भी होती है

जीवन में दुख होते हैं तो सुख की आशा भी होती है

घनघोर घटाएं छंट जाती हैं फिर धूप छिटकती है

न उदास हो मन, राहें कठिन-सरल सब होती हैं

अनुभव की थाती

पर्वतों से टकराती, उबड़-खाबड़ राहों पर जब नदी-नीर-धार बहती है

कुछ सहती, कुछ गाती, कहीं गुनगुनाती, तब गंगा-सी निर्मल बन पाती है

अपनेपन की राहों में ,फूल उगें और कांटे न हों, ऐसा कम ही होता है

यूं ही जीवन में कुछ खोकर, कुछ पाकर, अनुभव की थाती बन पाती है।

कुछ आहटें आवाज़ नहीं करती

कुछ आहटें

आवाज़ नहीं करती,

शोर नहीं मचातीं,

मन को झिंझोड़ती हैं,

समझाती हैं,

समय पर सचेत करती हैं,

बेआवाज़

कानों में गूंजती हैं।

दबे कदमों से

हमारे भीतर

प्रवेश कर जाती हैं।

दीवारों के आर-पार

भेदती हैं।

यदि कभी महसूस भी करते हैं हम

तो हमें शत्रु-सी प्रतीत होती हैं।

 

क्योंकि

हम शोर के आदी,

चीख-चिल्लाहटों के साथी,

जिह्वा पर विषधर पाले,

उन आहटों को पहचान ही नहीं पाते

जो ज़िन्दगी की आहट होती हैं

जो अपनों की आवाज़ होती हैं

जीवन-संगीत और साज़ होती हैं

 

भटकते हैं हम,

समझते और कहते हैं

हमारा कोई नहीं।

 

 

सबको बहकाते

पुष्प निःस्वार्थ भाव से नित बागों को महकाते

पंछी को देखो नित नये राग हमें मधुर सुनाते

चंदा-सूरज दिग्-दिगन्त रोशन करते हर पल

हम ही क्यों छल-कपट में उलझे सबको बहकाते

रात से सबको गिला है

रात और चांद का अजीब सा सिलसिला है
चांद तो चाहिए पर रात से सबको गिला है
चांद चाहिए तो रात का खतरा उठाना होगा
चांद या अंधेरा, देखना है, किसे क्या मिला है

बातों का ज्ञान नहीं

उन बातों पर बात करें, जिन बातों का ज्ञान नहीं

उन बातों पर उलझ पड़ें, जिन बातों का अर्थ नहीं

कुछ काम-काज की बात करें तो  है समय नहीं  

उन बातों पर मर मिटते हैं, जिन बातों का सार नहीं

समय ने करवट ली है

कभी समय था

जब एक छोटी सी चीख

हमारे अंत:करण को उद्वेलित कर जाती थी।

किसी पर अन्याय होता देख

रूह कांप जाती थी

उनके आंसू हमारे आंसू बन जाते थे

और उनके घाव

हमारे मन से रिसने लगते थे

औरों की किलकारी

हमारी दीपावली हुआ करती थी

और उनका मातम हमारा मुहरर्म।

 

एक आत्मा हुआ करती थी

जो पथभ्रष्ट होने पर हमें धिक्कारती थी

और समय समय पर सन्मार्ग दिखाती थी।

 

पर समय ने करवट ली है।

 

इधर कानों ने सुनना कम कर दिया है

और आंखों ने भी धोखा दे दिया है।

 

सुनने में आया है कि

हमारी आत्मा भी मर चुकी है।

 

इसे ही आधुनिक भाषा में

समय के साथ चलना कहते हैं।

इल्जाम बहुत हैं

इल्जाम बहुत हैं

कि कुछ लोग पत्थर दिल हुआ करते हैं।

पर यूं ही तो नहीं हो जाते होंगे

इंसान

पत्थर दिल ।

कुछ आहत होती होंगी संवेदनाएं,

समाज से मिली होंगी ठोकरें,

किया होगा किसी ने कपट

बिखरे होंगे सपने

और फिर टूटा होगा दिल।

तब  सीमाएं लांघकर

दर्द आंसुओं में बदल जाता है

और ज़माने से छुपाने के लिए

जब आंख में बंध जाता है

तो दिल पत्थर का बन जाता है।

इन पत्थरों पर अंकित होती हैं

भावनाएं,

कविताएं और शायरी।

कभी निकट होकर देखना,

तराशने की कोशिश जरूर करना

न जाने कितने माणिक मोती मिल जायें,

सदियों की जमी बर्फ पिघल जाये,

एक और पावन पवित्र गंगा बह जाये

और पत्थरों के बीच चमन महक जाये।

आशाओं-आकांक्षाओं का जाल

यह असमंजस की स्थिति है

कि जब भी मैं

सिर उठाकर

धरती से

आकाश को

निहारती थी

तब चांद-तारे सब

छोटे-छोटे से दिखाई देते थे

कि जब चाहे मुट्ठी में भर लूं।

दमकते सूर्य को

नज़बट्टू बनाकर

द्वार पर टांग लूं।

लेकिन  यहां धरती पर

आशाओं-आकांक्षाओं का जाल

निराकार होते हुए भी

इतना बड़ा है  

कि न मुट्ठी में आता है

न हृदय में समाता है।

चाहतें बड़ी-बड़ी

विशालकाय

आकाश में भी न समायें।

मन, छोटा-सा

ज़रा-ज़रा-सी बात पर

बड़ा-सा ललचाए।

खुली मुट्ठी बन्द नहीं होती

और बन्द हो जाये

तो खुलती नहीं,

दरकता है सब।

छूटता है सब।

टूटता है सब।

आकाश और धरती के बीच का रास्ता

बहुत लम्बा है

और अनजाना भी

और शायद अकेला भी।

 

खुली-बन्द होती मुट्ठियों के बीच

बस

रह जाता है आवागमन।

घुमक्कड़ हो गया है मन

घुमक्कड़ हो गया है मन

बिन पूछे बिन जाने

न जाने

निकल जाता है कहां कहां।

रोकती हूं, समझाती हूं

बिठाती हूं , डराती हूं, सुलाती हूं।

पर सुनता नहीं।

भटकता है, इधर उधर अटकता है।

न जाने किस किस से जाकर लग  जाता है।

फिर लौट कर

छोटी छोटी बात पर

अपने से ही उलझता है।

सुलगता है।

ज्वालामुखी सा भभकता है।

फिर लावा बहता है आंखों से।

एक बोध कथा

बचपन में

एक बोध कथा पढ़ाई जाती थी:

आंधी की आहट से आशंकित

घास ने

बड़े बड़े वृक्षों से कहा

विनम्रता से झुक जाओ

नहीं तो यह आंधी

तुम्हें नष्ट कर देगी।

वृक्ष सुनकर मुस्कुरा दिये

और आकाश की ओर सिर उठाये

वैसे ही तनकर खड़े रहे।

 

आंधी के गुज़र जाने के बाद

घास मुस्कुरा रही थी

और वृक्ष धराशायी थे।

 

किन्तु बोध कथा के दूसरे भाग में

जो कभी समझाई नहीं गई

वृक्ष फिर से उठ खड़े हुए

अपनी जड़ों से

आकाश की ओर बढ़ते हुए

एक नई आंधी का सामना करने के लिए

और झुकी हुई घास

सदैव पैरों तले रौंदी जाती रही।

 

आंख को धुंधला अहं भी कर देता है

लोग, अंधेरे से घबराते हैं

मुझे, उजालों से डर लगता है।

प्रकाश देखती हूं

मन घबराने लगता है

सूरज निकलता है

आंखें चौंधिया जाती हैं

ज़्यादा रोशनी

आंख को अंधा कर देती है।

फिर

पैर ठोकर खाने लगते हैं,

गिर भी सकती हूं,

चोट भी लग सकती है,

और जान भी जा सकती है।

किन्तु जब अंधेरा होता है,

तब आंखें फाड़-फाड़ कर देखने का प्रयास

मुझे रास्ता दिखाने लगता है।

गिरने का भय नहीं रहता।

और उजाले की अपेक्षा

कहीं ज़्यादा दिखाई देने लगता है।

 

आंखें

अभ्यस्त हो जाती हैं

नये-नये पथ खोजने की

डरती नहीं

पैर भी नहीं डगमगाते

वे जान जाते हैं

आगे अवरोध ही होंगे

पत्थर ही नहीं, गढ्ढे भी होंगे।

पर अंधेरे की अभ्यस्त आंखें

प्रकाश की आंखों की तरह

चौंधिया नहीं जातीं।

राहों को तलाशती

सही राह पहचानतीं

ठोकर खाकर भी आगे बढ़ती हैं

प्रकाश की आंखों की तरह

एक अहं से नहीं भर जातीं।

 

आंख को धुंधला

केवल आंसू ही नहीं करते

अहं भी कर देता है।

वैसे मैं तुम्हें यह भी बता दूं

कि ज़्यादा प्रकाश

आंख के आगे अंधेरा कर देता है

और ज़्यादा अंधेरा

आंख को रोशन

 

अत:

मैं रोशनी का अंधापन नहीं चाहती

मुझे

अंधेरे की नज़र चाहिए

जो रात में दिन का उजाला खोज सके

जो अंधेरे में

प्रकाश की किरणें बो सके

और प्रकाश के अंधों को

अंधेरे की तलाश

और उसकी पहचान बता सके।