वनचर इंसानों के भीतर

कहते हैं

प्रकृति स्वयंमेव ही

संतुलन करती है।

रक्षक-भक्षक स्वयं ही

सर्जित करती है।

कभी इंसान

वनचर था,

हिंसक जीवों के संग।

फिर वन छूट गये

वनचरों के लिए।

किन्तु समय बदला

इंसान ने छूटे वनों में

फिर बढ़ना शुरु कर दिया

और अपने भीतर भी

बसा लिए वनचर ।

और वनचर शहरों में दिखने लगे।

कुछ स्वयं आ पहुंचे

और कुछ को हम ले आये

सुरक्षा, मनोरजंन के लिए।

.

अब प्रतीक्षा करते हैं

इंसान फिर वनों में बसता है

या वनचर इंसानों के भीतर।

  

कहते हैं

प्रकृति स्वयंमेव ही

संतुलन करती है।

रक्षक-भक्षक स्वयं ही

सर्जित करती है।

कभी इंसान

वनचर था,

हिंसक जीवों के संग।

फिर वन छूट गये

वनचरों के लिए।

किन्तु समय बदला

इंसान ने छूटे वनों में

फिर बढ़ना शुरु कर दिया

और अपने भीतर भी

बसा लिए वनचर ।

और वनचर शहरों में दिखने लगे।

कुछ स्वयं आ पहुंचे

और कुछ को हम ले आये

सुरक्षा, मनोरजंन के लिए।

.

अब प्रतीक्षा करते हैं

इंसान फिर वनों में बसता है

या वनचर इंसानों के भीतर।

  

अपनी ज़िन्दगी

प्यास अपनी खुद बुझाना सीखो

ज़िन्दगी में बेवजह मुस्कुराना सीखो

कब तक औरों के लिए जीते रहोगे

अपनी ज़िन्दगी खुद संवारना सीखो

सीधी राहों की तलाश में जीवन

अपने दायरे आप खींच

न तकलीफ़ों से आंखें मींच

.

हाथों की लकीरें

अजब-सी

आड़ी-तिरछी होती हैं,

जीवन की राहें भी

शायद इसीलिए

इतनी घुमावदार होती हैं।

किन्तु इन

घुमावदार राहों

पर खिंची

आड़ी-तिरछी लकीरें

गोल दायरों में घुमाती रहती हैं

जीवन भर

और हम

इन राहों के आड़े-तिरछेपन,

और गोल दायरों के बीच

अपने लिए

सीधी राहों की तलाश में

घूमते रहते हैं जीवन भर।

 

जीने की चाहत

जीवन में

एक समय आता है

जब भीड़ चुभने लगती है।

बस

अपने लिए

अपनी राहों पर

अपने साथ

चलने की चाहत होती है।

बात

रोशनी-अंधेरे की नहीं

बस

अपने-आप से बात होती है।

जीवन की लम्बी राहों पर

कुछ छूट गया

कुछ छोड़ दिया

किसी से नहीं कोई आस होती है।

न किसी मंज़िल की चाहत है

न किसी से नाराज़गी-खुशी

बस अपने अनुसार

जीने की चाहत होती है।

 

हम हार नहीं माना करते

तूफ़ानों से टकराते हैं

पर हम हार नहीं माना करते।

प्रकृति अक्सर अपना

विकराल रूप दिखलाती है

पर हम कहाँ सम्हलकर चलते।

इंसान और प्रकृति के युद्ध

कभी रुके नहीं

हार मान कर

हम पीछे नहीं हटते।

प्रकृति बहुत सीख देती है

पर हम परिवर्तन को

छोड़ नहीं सकते,

जीवन जीना है तो

बदलाव से

हम पीछे नहीं हट सकते।

सुनामी आये, यास आये

या आये ताउते

नये-नये नामों के तूफ़ानों से

अब हम नहीं डरते।

प्रकृति

जितना ही

रौद्र रूप धारण करती है

मानवता उससे लड़ने को

उतने ही

नित नये साधन जुटाती है।

 

तब प्रकृति भी मुस्काती है।

 

जग का यही विधान है प्यारे

जग का यही विधान है प्यारे

यहां सोच-समझ कर चल।

रोते को बोले

हंस ले, हंस ले प्यारे,

हंसते पर करे कटाक्ष

देखो, हरदम दांत निपोरे।

चुप्पा लगता घुन्ना, चालाक,

जो मन से खुलकर बोले

बड़बोला, बेअदब कहलाए

जग का यही विधान है प्यारे।

सच्चे को झूठा बतलाए

झूठा जग में झण्डा लहराए।

चलती को गाड़ी कहें

जब तक गाड़ी चलती रहे

झुक-झुक करें सलाम।

सरपट सीधी राहों पर

सरल-सहज जीवन चलता है

उंची उड़ान की चाहत में

मन में न सपना पलता है।

मुझको क्या लेना

मोटर-गाड़ी से

मुझको क्या लेना

ऊँची कोठी-बाड़ी से

छोटी-छोटी बातों में

मन रमता है।

चढ़ते सूरज को करें सलाम।

पग-पग पर अंधेरे थे

वे किसने देखे

बस उजियारा ही दिखता है

जग का यही विधान है प्यारे

यहां सोच-समझ कर चल।

एैसे भी झूले झुलाती है ज़िन्दगी

वाह! ज़िन्दगी !

.

कहाँ पता था

एैसे भी झूले झुलाती है ज़िन्दगी।

आकाश-पाताल

सब एक कर दिखाती है ज़िन्दगी।

क्यों

कभी-कभी इतना डराती है ज़िन्दगी।

शेर-चीते तो सपनों में भी आयें

तब भी नींद उड़ जाती है।

न जाने

किसके लिए कह गये हैं

हमारे बुज़ुर्ग

कि न दोस्ती भली न दुश्मनी।

ये दोस्ती निभा रहे हैं

या दुश्मनी,

ये तो पता नहीं,

किन्तु मेरे

धरा और आकाश

दोनों छीनकर

आनन्द ले रहे हैं,

और मुझे कह रहे हैं

जा, जी ले अपनी ज़िन्दगी।

 

आस लिए जीती हूँ

सपनों में जीती हूँ

सपनों में मरती हूँ

सपनों में उड़ती हूँ

ऐसे ही जीती हूँ।

धरा पर सपने बोती हूँ

गगन में छूती हूँ ।

मन में चाँद-तारे बुनती हूँ।

बादलों-से उड़ जाते हैं,

हवाएँ बहकाती हैं

सहम जाता है मन

पंछी-सा,

पंख कतरे जाते हैं

फिर भी उड़ती हूँ।

लौट धरा पर आती हूँ,

पर गगन की

आस लिए जीती हूँ।

 

जीवन क्या होता है

जीवन में अमृत चाहिए

तो पहले विष पीना पड़ता है।

जीवन में सुख पाना है

तो दुख की सीढ़ी पर भी

चढ़ना पड़ता है।

धूप खिलेगी

तो कल

घटाएँ भी घिर आयेंगी

रिमझिम-रिमझिम बरसातों में

बिजली भी चमकेगी

कब आयेगी आँधी,

कब तूफ़ान से उजड़ेगा सब

नहीं पता।

जीवन में चंदा-सूरज हैं

तो ग्रहण भी तो लगता है

पूनम की रातें होती हैं

अमावस का

अंधियारा भी छाता है।

किसने जाना, किसने समझा

जीवन क्या होता है।

 

न जाने अब क्या हो

बस शैल्टर में बैठे दो

सोच रहे हैं न जाने क्या हो।

‘गर बस न आई तो क्या हो।

दोनों सोचे दूजा बोले

तो कुछ तो साहस हो।

बारिश शुरु होने को है

‘गर हो गई तो

भीग जायेंगे

कहीं बुखार हो गया तो।

कोरोना का डर लागे है

पास  होकर पूछें तो।

घर भी मेरा दूर है

क्या इससे बात करुँ

साथ चलेगा ‘गर जो

बस न आई अगर

कैसे जाउंगी मैं घर को।

यह अनजान आदमी

अगर बोल ले बोल दो।

तो कुछ साहस होगा जो

सांझ ढल रही,

लाॅक डाउन का समय हो गया

अंधेरा घिर रहा

न जाने अब क्या हो।

 

खून का असली रंग

हमारे यहाँ

रगों में बहते खून की

बहुत बात होती है।

किसी का खून खानदानी,

किसी का उजला,

किसी का काला

किसी का अपना

और किसी का पराया।

तब आसानी से

कह देते हैं

अपना तो खून ही

ख़राब निकला।

और

ऐसा नीच खून

तो हमारा खून

हो ही नहीं सकता।

-

लेकिन

काश! हम समझ पाते

कि रगों में बहते खून का

कोई रंग नहीं होता

खून का रंग तब होता है

जब वह किसी के काम आये।

फिर अपना हो या पराया,

खानदानी हो या काला,

खून का असली रंग

तभी पहचान में आता है।

लाल, नीला या काला

होने से कभी

कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

 

जीवन के कितने पल

वियोग-संयोग भाग्य के लेखे

अपने-पराये कब किसने देखे

दुःख-सुख तो आने-जाने हैं

जीवन के कितने पल किसने देखे।

 

उलझे बैठे हैं अनजान राहों में

जीवन ऊँची-नीची डगर है।

मन में भावनाओं का समर है।

उलझे बैठे हैं अनजान राहों में

मानों अंधेरों में ही अग्रसर हैं।

ज़िन्दगी के सवाल

ज़िन्दगी के सवाल

कभी भी

पहले और आखिरी नहीं होते।

बस सवाल होते हैं

जो एक-के-बाद एक

लौट-लौटकर

आते ही रहते हैं।

कभी उलझते हैं

कभी सुलझते हैं

और कभी-कभी

पूरा जीवन बीत जाता है

सवालों को समझने में ही।

वैसे ही जैसे

कभी-कभी हम

अपनी उलझनों को

सुलझाने के लिए

या अपनी उलझनों से

बचने के लिए

डायरी के पन्ने

काले करने लगते हैं

पहला पृष्ठ खाली छोड़ देते हैं

जो अन्त तक

पहुँचते-पहुँचते

अक्सर फ़ट जाता है।

तब समझ आता है

कि हम तो जीवन-भर

निरर्थक प्रश्नों में

उलझे रहे

न जीवन का आनन्द लिया

और न खुशियों का स्वागत किया।

और इस तरह

आखिरी पृष्ठ भी

बेकार चला जाता है।

 

अब कांटों की बारी है

फूलों की बहुत खेती कर ली

अब कांटों की बारी है।

पत्‍ता–पत्‍ता बिखर गया

कांटों की सुन्‍दर मोहक क्‍यारी है।

न जाने कितने बीज बोये थे

रंग-बिरंगे फूलों के।

सपनों में देखा करती थी

महके महके गुलशन के रंगों के।

मिट्टी महकी, बरसात हुई

तब भी, धरा न जाने कैसे सूख गई।

नहीं जानती, क्‍योंकर

फूलों के बीजों से कांटे निकले

परख –परख कर जीवन बीता

कैसे जानूं कहां-कहां मुझसे भूल हुई। 

दोष नहीं किसी को दे सकती

अब इन्‍हें सहेजकर बैठी हूं।

वैसे भी जबसे कांटों को अपनाया

सहज भाव से जीवन में

फूलों का अनुभव दे गये

रस भर गये जीवन में।

 

मेंहदी के रंगों की तरह

जीवन के रंग भी अद्भुत हैं।

हरी मेंहदी

लाल रंग छोड़ जाती है।

ढलते-ढलते गुलाबी होकर

मिट जाती है

लेकिन अक्सर

हाथों के किसी कोने में

कुछ निशान छोड़ जाती है

जो देर तक बने रहते हैं

स्मृतियों के घेरे में

यादों के, रिश्तों के,

सम्बन्धों के,

अपने-परायों के

प्रेम-प्यार के

जो उम्र के साथ

ढलते हैं, बदलते हैं

और अन्त में

कितने तो मिट जाते हैं

मेंहदी के रंगों की तरह।

 

जैसे हम नहीं जानते

जीवन में

कब हरीतिमा होगी,

कब पतझड़-सा पीलापन

और कब छायेगी फूलों की लाली।

  

 

जीवन कितने पल

किसने जाना जीवन कितने पल।

अनमोल है जीवन का हर पल।

यहां दुख-सुख तो आने जाने हैं

आनन्द उठा जीवन में पल-पल।

   

अजब-सी भटकन है

फ़िरकी की तरह

घूमती है ज़िन्दगी।

कभी इधर, कभी उधर।

दुनियादारी में उलझी

कभी सुलझी, कभी न सुलझी।

अपनी-सी न लगती

जैसे उधारी किसी की।

अजब-सी भटकन है

कामनाओं का पर्वत है

उम्र पूछती है नाम।

अक्सर मन करता है

चादर ले

सिर ढक और लम्बी तान।

किन्तु

उन सलवटों का क्या करुं

जिन्हें वर्षों से छुपाती आ रही हूँ,

उन धागों का क्या करुँ

जिन्हें दुनिया-भर में तानती आ रही हूँ।

.

यार ! छोड़ अब ये ढकोसले।

बस, अपनी छान।

चादर ले

सिर ढक और लम्बी तान।

 

झूला झुलाये जिन्‍दगी

कहीं झूला झुलाये जिन्‍दगी

कभी उपर तो कभी नीचे

लेकर आये जिन्‍दगी

रस्सियों पर झूलती

दूर से तो दिखती है

आनन्‍द देती जिन्‍दगी

बैठना कभी झूले पर

आकाश और  धरा

एक साथ दिखा देती है जिन्‍दगी

कभी हाथ छूटा, कभी तार टूटी

तो दिन में ही

तारे दिखा देती है जिन्‍दगी

सम्‍हलकर बैठना जरा

कभी-कभी सीधे

उपर भी ले जाती है जिन्‍दगी

 

 

सलाह की कोई कीमत नहीं होती

मेरे पिता कहा करते थे

सलाह की

कोई कीमत नहीं होती

लेकिन इसका यह मतलब नहीं

कि यूं ही मुफ़्त में बांटते फ़िरो।

कभी-कभी मुफ़्त में

दी गई सलाह की

बड़ी कीमत

हाथ-पैरों, हड्डियों को

चुकानी पड़ती है,

ध्यान रहे।

.

और मेरे पिता

यह भी कहा करते थे

कि सलाह की

कोई कीमत नहीं होती

जो दे,

बस चुपचाप ले लिया करो,

और जोड़ते रहो

मन की तिजोरी में।

बिना कीमत की सलाह

कभी-कभी

बड़ी कीमती होती है।

लेकिन

यह भी कहा करते थे

कि जब तक

मिली सलाह की

कीमत समझ आती है

उसकी

एक्सपायरी डेट

निकल चुकी होती है।

-

और हंस देते थे

इसे मेरी

कीमती सलाह समझना।

 

 

शायद यही जीवन है

इन राहों पर

खतरनाक अंधे मोड़

होते हैं

जो दिखते तो नहीं

बस अनुभव की बात होती है

कि आप जान जायें

पहचान जायें

इन अंधों मोड़ों को

नहीं जान पाते

नहीं देख पाते

नहीं समझ पाते

कि उस पार से आने वाला

जीवन लेकर आ रहा है

या मौत।

इधर ऊँचे खड़े पहाड़

कभी  छत्रछाया-से लगते हैं

और कभी दरकते-खिसकते

जीवन लीलते।

उधर गहरी खाईयां डराती हैं

मोड़ों पर।

.

फिर

बादलों के घेरे

बरसती बूंदें

अनुपम, अद्भुत,

अनुभूत सौन्दर्य में

उलझता है मन।

.

शायद यही जीवन है। 

 

छोटा-सा जीवन है हंस ले मना

छोटा-सा जीवन है हंस ले मना     

जीवन में

बार-बार अवसर नहीं मिलते,

धूप ज्यादा हो

तो सदैव बादल नहीं घिरते,

चांद कभी कहीं नहीं जाता

बस हमारी ही समझ का फेर है

कभी पूर्णिमा

कभी ईद और कभी अमावस

की बात करते हैं

निभा सको तो निभा लो

हर मौसम को जीवन में

यूं जीने के अवसर

बार-बार नहीं मिलते

रूठने-मनाने का

सिला तो जीवन-भर चला रहता है

अपनों को मनाने के

अवसर बार -बार नहीं मिलते

कहते हैं छोटा-सा जीवन है

हंस ले मना,

यूं अकारण

खुश रहने के अवसर

बार-बार नहीं मिलते

 

 

 

हर दिन जीवन

जीवन का हर पल

अनमोल हुआ करता है

कुछ कल मिला था,

कुछ आज चला है

न जाने कितने अच्छे पल

भवितव्य में छिपे बैठे हैं

बस आस बनाये रखना

हर दिन खुशियां लाये जीवन में

एक आस बनाये रखना

मत सोचना कभी

कि जीवन घटता है।

बात यही कि

हर दिन जीवन

एक और,

एक और दिन का

सुख देता है।

फूलों में, कलियों में,

कल-कल बहती नदियों में

एक मधुर संगीत सुनाई देता है

प्रकृति का कण-कण

मधुर संगीत प्रवाहित करता है।

 

एक उपहार है ज़िन्दगी

हर रोज़ एक नई कथा पढ़ाती है जिन्दगी

हर दिन एक नई आस लाती है ज़िन्दगी

कभी हंसाती-रूलाती-जताती है ज़िन्दगी

हर दिन एक नई राह दिखाती है ज़िन्दगी

कदम दर कदम नई आस दिलाती है जिन्दगी

घनघोर घटाओं में भी धूप दिखाती है जिन्दगी

कभी बादलों में कड़कती-चमकती-सी है ज़िन्दगी

कुछ पाने के लिए निरन्तर भगाती है जिन्दगी

भोर से शाम तक देखो जगमगाती है जिन्दगी

झड़ी में भी कभी-कभी धूप दिखाती है जिन्दगी

कभी आशाओं का सागर लहराती है जिन्दगी

और कभी कभी खूब धमकाती भी है जिन्दगी

तब दांव पर पूरी लगानी पड़ती है जिन्दगी

यूं ही तो नहीं  आकाश दिला देती है जिन्दगी

पर कुल मिलाकर देखें तो एक उपहार है ज़िन्दगी

 

भूल-भुलैया की इक नगरी होती

भूल-भुलैया की इक नगरी होती

इसकी-उसकी बात न होती

सुबह-शाम कोई बात न होती

हर दिन नई मुलाकात तो होती

इसने ऐसा, उसने वैसा

ऐसे कैसे, वैसे कैसे

कोई न कहता।

रोज़ नई-नई बात तो होती

गिले-शिकवों की गली न होती,

चाहे राहें छोटी होतीं

या चौड़ी-चौड़ी होतीं

बस प्रेम-प्रीत की नगरी होती

इसकी-उसकी, किसकी कैसे

ऐसी कभी कोई बात न होती

 

 

 

ज़िन्दगी के रास्ते

यह निर्विवाद सत्य है

कि ज़िन्दगी

बने-बनाये रास्तों पर नहीं चलती।

कितनी कोशिश करते हैं हम

जीवन में

सीधी राहों पर चलने की।

निश्चित करते हैं कुछ लक्ष्य

निर्धारित करते हैं राहें

पर परख नहीं पाते

जीवन की चालें

और अपनी चाहतें।

ज़िन्दगी

एक बहकी हुई

नदी-सी लगती है,

तटों से टकराती

कभी झूमती, कभी गाती।

राहें बदलती

नवीन राहें बनाती।

किन्तु

बार-बार बदलती हैं राहें

बार-बार बदलती हैं चाहतें

बस,

शायद यही अटूट सत्य है।

 

 

गुनगुनाता है चांद

शाम से ही

गुनगुना रहा है चांद।

रोज ही की बात है

शाम से ही

गुनगुनाता है चांद।

सितारों की उलझनों में

वृक्षों की आड़ में

नभ की गहराती नीलिमा में

पत्‍तों के झरोखों से,

अटपटी रात में

कभी इधर से,

कभी उधर से

झांकता है चांद।

छुप-छुपकर देखता है

सुनता है,

समझता है सब चांद।

कुछ वादे, कुछ इरादे

जीवन भर

साथ निभाने की बातें

प्रेम, प्‍यार के किस्‍से,

कुछ सच्‍चे, कुछ झूठे

कुछ मरने-जीने की बातें

सब जानता है

इसीलिए तो

रोज ही की बात है

शाम से ही

गुनगुनाता है चांद

 

 

 

उम्र का एक पल: और पूरी ज़िन्दगी

पता ही नहीं लगा

उम्र कैसे बीत गई

अरे !

पैंसठ की हो गई मैं।

अच्छा !!

कैसे बीत गये ये पैंसठ वर्ष,

मानों कल की ही घटना हो।

-

स्मृतियों की

छोटी-सी गठरी है

जानती हूं

यदि खोलूंगी, खंगालूंगी

इस तरह बिखरेगी

कि समझने-समेटने में

अगले पैंसठ वर्ष लग जायेंगे।

और यह भी नहीं जानती

हाथ आयेगी रिक्तता

या कोई रस।

-

और कभी-कभी

ऐसा क्यों होता है

कि उम्र का एक पल

पूरी ज़िन्दगी पर

भारी हो जाता है

और हम

दिन, महीने, साल,

गिनते रह जाते हैं

लगता है मानों

शताब्दियां बीत गईं

और हम

अपने-आपको वहीं खड़ा पाते हैं।

 

अनछुए शब्द

 कुछ भाव

चेहरों पर लिखे जाते हैं

और कुछ को शब्द दिये जाते हैं

शब्द कभी अनछुए

एहसास दे जाते हैं ,

कभी बस

शब्द बनकर रह जाते हैं।

किन्तु चेहरे चाहकर भी

झूठ नहीं बोल पाते।

चेहरों पर लिखे भाव

कभी कभी

एक पूरा इतिहास रच डालते हैं।

और यही

भावों का स्पर्श

जीवन में इन्द्र्धनुषी रंग भर देता है।

 

हारना नहीं है

चलो आज ज़िन्दगी को हम कुछ सिखाएं।

कैसा भी समय हो, मन में मलाल न लाएं।

मन पुलकित होता है जब आस जगती है,

हारना नहीं है, इसी बात पर खिलखिलाएं।