अकेला ही चला जा रहा है आदमी
अपने भीतर
अपने-आपसे ही कट रहा है आदमी।
कहाँ जायें, कैसे जायें
कहाँ समझ पर रहा है आदमी।
टुकड़ों में है जीवन बीत रहा
बस
ऐसे ही तो चला जा रहा है आदमी।
कुछ काम का बोझ,
कुछ जीवन की नासमझी
कहाँ कोई साथ देता है
बस अकेला ही चला जा रहा है आदमी।
पानी की गहराई
नहीं जानता है
इसलिए पत्थरों पर ही
कदम-दर-कदम बढ़ रहा है आदमी।
देह कब तक साथ देगी
नहीं जानता
इसलिए देह को भी मन से नकार रहा है आदमी।