इच्छाओं का कोई अन्त नहीं

हमारी इच्छाओं का

कोई अन्त नहीं।

बालपन में

चिन्ताओं से दूर

मस्ती में जीते थे

किन्तु बड़ों को देखकर

आहें भरते थे।

कब बड़े होंगे हम।

बड़ों के स्वांग भर

खूब आनन्द लेते थे हम।

बड़े हुए

तो बालपन में

मन भटकने लगा

अक्सर कहते फ़िरते

आह! काश!

हम फिर बच्चे बन जायें।

और वृ़द्धावस्था क्या आई

सब कहने लगे

वृद्ध और बाल

तो समान ही होते हैं।

 

ऐसा नहीं होता रे

कोई मेरे मन से पूछे

इच्छाएँ कभी नहीं मरतीं

बालपन हो

युवावस्था अथवा वृद्धावस्था

चक्रव्यूह की भांति

जीवन भर उलझाये रखती हैं

जो मिला है,

वह भाता नहीं

जो नहीं मिला

वह जीवन-भर आता नहीं।