एकान्त काटता है

धरा दरक रही, वृक्ष पल्लवविहीन हो गये

एकान्त काटता है, साथी कोई रह गये

आँखें शून्य में ताकती, नहीं कोई दूर तक

श्वेताभा में भी नैराश्य मानों सब पराये हो गये