मन करता करूँ बात चाँद  तारों से

मन करता करूँ बात चाँद  तारों से

जाने कितने भाव

कितनी बातें

अनकही, सुलझी-अनसुलझी

भीतर-ही-भीतर

कचोटती हैं

बिलखती हैं

बहुत कुछ बोलती हैं।

किसी से कहते हुए

मन डरता है

कहीं कोई पूछ ले

कोई बात की बात हो जाये

कहीं पुराने ज़ख्म खुल जायें

कहीं कोई अपनापन दिखाए

और हम शत्रुता का भाव पायें

जाने किस बात का

कौन-सा अर्थ निकल आये

खुले गगन के नीचे

चाँद -तारों से बतियाती हूँ

मन की हर बात बताती हूँ

और गहरी नींद सो जाती हूँ