क्यों आज की पीढ़ी परम्पराओं से विमुख हो रही है
वर्तमान में सामान्य तौर पर वर्तमान पीढ़ी पर यह आरोप है कि वह पारिवारिक व अन्य परम्पराओं से विमुख होती जा रही है, क्या यह सत्य है और यदि है तो क्यों, विचारणीय प्रश्न है।
इस प्रश्न को मैं दो रूपों में समझने का प्रयास करती हूॅं।
जी हाॅं, आज की पीढ़ी अपनी पारिवारिक प्राचीन परम्पराओं से विमुख हो रही है। और मैं इसमें आज की पीढ़ी को बिल्कुल दोषी नहीं मानती। समय बदलता है, शिक्षा बदली है, रहन-सहन बदले हैं, आवश्यकताएॅं और पारिवारिक, सामाजिक व्यवस्था सब बदल गये हैं।
इसके अनेक कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है हम अपनी अधिकांश पारिवारिक परम्पराओं के गहन निहितार्थ से परिचित ही नहीं हैं। बहुत सी परम्पराओं के पीछे कौन से पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक कारण थे हम समय के साथ भूल चुके हैं, अथवा अल्प ज्ञान के साथ ही निभाने का प्रयास करते हैं। पिछले समय में अधिकांश महिलाएॅं घर में ही रहती थीं और संयुक्त एवं बड़े परिवार हुआ करते थे। इस कारण पारिवारिक परम्पराओं के बारे में जानकारी भी रहती थी और परस्पर मिलकर निभाने का आनन्द भी मिलता था। वर्तमान पीढ़ी तक ये परम्पराएॅं विश्रृंखलित होकर पहुॅंची हैं अतः उन्हें जो परम्पराएॅं निभाने में सुविधाजनक एवं मनोरंजक प्रतीत होती हैं उन्हें निभा लेते हैं, शेष की उपेक्षा कर जाते हैं।
फिर वर्तमान में परम्पराओं का भी बाज़ारीकरण हो चुका है। हमारी परम्पराएॅं घर के भीतर से निकलकर बाज़ार का हिस्सा बन चुकी हैं। और आज जो बाज़ार में बिकता है और दिखता है वही परम्परा बनता जा रहा है। ऐसी स्थितियों को सम्भवतः कोई नहीं रोक पाता अथवा बदल पाता है, केवल स्वीकोरक्ति ही इसका हल है।