रिश्तों को पैसे के तराजू में तोलना कहाॅं तक उचित है?
बात उचित-अनुचित की नहीं है, हमारी मानसिकता की है।
दुखद किन्तु सत्य यही है कि रिश्ते सदैव ही पैसों के तराजू में तोले जाते रहे हैं। यह कांेई आज की बात नहीं है, सदियों से ही यही होता आया है। मैंने अपने जीवन में यही सब समझा और देखा है। बहुत कम लोग हैं जो अपने सम्बन्धों को धन-दौलत से अलग, मन से निभाते हैं। कहावत भी है कि पैसा पैसे को खींचता है। यह बात केवल व्यवसाय अथवा धन-निवेश की नहीं है, सम्बन्धों, मैत्री की भी है। जब कोई धनवान किसी निर्धन से व्यवहार करता है तो उसकी बहुत सराहना की जाती है कि देखो, गरीब-अमीर में अन्तर नहीं करता। समाज द्वारा की जाने वाली यह सराहना ही बताती है कि रिश्ते पैसों के तराजू में तोले जाते हैं। यदि ऐसा न होता तो सम्बन्धों में निर्धन-धनी की बात ही न उठती। जब कभी किसी नये रिश्ते की ओर बढ़ना हो तो भी यही कहा जाता है कि भई, अपने बराबर का देखना।
यह बात आज की नहीं है, सदा से ही यही रीति रही है। कहाॅं राजा भोज कहाॅं गंगू तेली जैसी कहावतें इस सोच को चरितार्थ करती हैं। मैंने अपने आस-पास कितने ही व्यवहार देखे हैं। डूबते व्यक्ति को कोई सहारा नहीं देता, यदि देता है तो बस इतना कि ये लो और निकलो, लौटकर मत आना। यही इस समाज की सच्चाई है।