ज़िन्दगी जीना भूल जाते हैं
ज़िन्दगी में
तप, उपासना, साधना
ज्ञान, ध्यान, स्नान
किसी काम नहीं आतीं।
जीवन भर करते रहिए
मरते रहिए
कब उपलब्धियाँ
कैसे हाथ से
सरक जायेंगी
पता ही नहीं लगता।
ज़िन्दगी जीने से ज़्यादा
हम न जाने क्यों
लगे रहते हैं
तप, उपासना, साधना में
और ज़िन्दगी जीना भूल जाते हैं
वह सब पाने के पीछे भागने लगते हैं
जिसका अस्तित्व ही नहीं।
आभासी दुनिया में जीने लगते हैं,
पारलौकिकता को ढूँढने में
लगे रहते हैं
और लौकिक संसार के
असीम सुखों से
मुँह मोड़ बैठते हैं
न जीवन जीते हैं
और न जीने देते हैं।
और अपने जीवन के
अमूल्य दिन खो देते हैं
वह सब पाने के लिए
जिसका अस्तित्व ही नहीं।